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Tuesday, August 8, 2017

प्रेम का घनत्व कुछ ज्यादा है

poem by Umesh chandra srivastava

                           -१-
प्रेम का घनत्व कुछ ज्यादा है ,
इसीलिए सब कुछ आधा-आधा है।
वरना कुछ जनों की दुश्वारियां देखिये ,
बाप-बेटे में कुछ भी नहीं साझा है।

                          - २ -
वो रोज़ आते हैं सुबह से शाम तलक रहने के वास्ते ,
रात होते ही चले जाते हैं ,सब बंद किये।
अब तो ज़माना है देर रात तलक , लोग करते हैं ,
सारी तिज़ारत ,छल-प्रपंच ,दंद-फंद अपने लिए।




उमेश चंद्र श्रीवस्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

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