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Sunday, August 6, 2017

मुरलीधर को यह राखी बहन बांधती

poem by Umesh chandra srivastava 

मुरलीधर को यह राखी बहन बांधती ,
अब हमारी तुम रक्षा करो भाई तुम। 
हंस के बोले कन्हैया-क्या चहिये तुम्हें ?
हंस पड़ी तब सुभद्रा मगन हो गयी। 
भाई से बस बहन की ये चाहत सुनो ,
रक्षा बंधन अमर हो बहन-भाई का।  
युग-युगों से यह बंधन बढ़े रात-दिन ,
भाई खुश-खुश रहे बहन भी हो मगन। 
ये लगन-ये दुलारा सा प्रेम प्रहर ,
हर समय गूंजे बहना का दिल हो सघन। 
भाई-बहनों का त्यौहार फलता रहे ,
प्रेम की गूँज से ये जहां हो मगन।  




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 






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