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Saturday, August 5, 2017

ये ईंगला ,ये पिंगला , शुषुम्ना ये नाड़ी

poem by Umesh chandra srivastava 

                        (१)
ये ईंगला ,ये पिंगला , सुषुम्ना ये नाड़ी ,
सभी कुछ तनों में बने तुम अनाड़ी। 
कहाँ खोजते फिरते उसको भरम में ,
तुम्हीं हो अगोचर तुम्हीं हो खिलाड़ी। 
                        (२ )
ये कवि का मंच है कविता दिवस हम सब मनाएंगे ,
उन्हें हम याद करके छंद 'औ' कुछ गीत गाएंगे। 
लिखे हैं गीत उनने कुछ सलोने काव्य में देखो ,
बड़ा ही मार्मिक चित्रण 'औ' सुन्दर बोल पाएंगे। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

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