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Sunday, August 13, 2017

बड़े कवि अगर हो ,लिखो बात ऐसी-3

poem by Umesh chandra srivastava

बड़े कवि अगर हो ,लिखो बात ऐसी ,
धरा का अँधेरा सभी मिट ही जाए।

(गतांक से आगे )


पुरंदर बने हम यहां घूमते हैं ,
वहां अपने बेटे ही तन झोंकते हैं।
लिखो बात उनकी वतन के लिए जो ,
वतन पे मरे जो , वतन के लिए हों।

ये नेता , मिनिस्टर को भी सीख देदो ,
वतन के लिए वो भी सरहद पे जाएँ।
खुले मंच पे न ये गालें बजाएं ,
कहो हाँथ ले के संगीनें वहं जाएँ। (क्रमशः कल )






उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

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