month vise

Thursday, June 22, 2017

कृषक

poem by Umesh chandra srivastava 


                       <1>

हे कृषक तुम्हारा पूजन कर ,
श्रद्धा के पुष्प चढ़ाएंगे।
सत्ता के लोलुप सारे तो ,
तेरी आहाट पहचानेंगे।
निर्भीक रहो ,तुम मौन नहीं ,
निज हक़ के खातिर डट जाओ।
ये धुनी रमाये बैठे जो -
उनको ललकारो ,फटकारो।
सत्ता के सारे बनिया ये ,
तेरे चरणों में झुकेंगे।
बस अपनी ताकत ,
गौरव तुम -
इनको दिखलाओ ,
जहाँ भी हों।
माना जीवन तो अन्नो बल ,
चलता है ,चलता जाएगा।
तुम अन्न देवता वसुधा के ,
तुमको नतमस्तक है प्रणाम।

                       <2>

बिखरे तुम रहते -आये हो,
यह लोकतंत्र है जानो तुम !
बच्चा भी जब चिल्लाता है ,
तब माँ देती है दूध उसे।
तुम भी गर्जन-तर्जन करके ,
अपने अधिकार को मांगों तो।
ये भयाक्रान्त सत्ता धारी ,
भय खाएंगे 'औ' देंगे तुम्हें।
बस हक़ के खातिर डटे रहो ,
ये बात तुम्हारी मानेंगे।
          तुम अन्न देवता वसुधा के ,
          तुमको नतमस्तक है प्रणाम।







उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Monday, June 19, 2017

राम का काव्य सुन्दर, सुहावन यहां



राम का काव्य सुन्दर, सुहावन यहां ,
राम तो हैं रमें ,राममय है जहाँ।
सीता सुन्दर ,लखन भ्रात अद्भुत यहां ,
शत्रुघन की कला , प्रेम अद्भुत रहा।
'औ' भरत की तो बातें न पूछो कभी ,
वह हैं द्रष्टा उन्होंने रचा राम मय।
     राम का काव्य सुन्दर, सुहावन यहां।

वाह रे! दशरथ ,कौशल्या ,सुमित्रा यहाँ ,
कैकेई की कला राम ने खूब कही।
उनको माता की श्रेष्ठतम उपाधि दयी ,
राम ही हैं रमे राममय है जहां।
उनका कर्त्तव्य कितना ही सुन्दर रहा ,
बाल्मीकी ने राम को मानव कहा।
तुलसी बाबा ने उनको है ब्रह्म रचा ,
श्रेष्ठ हैं मैथिलि जिनकी साकेत है।
उसमें उर्मिल 'औ' लक्ष्मण का अद्भुत मिला,
उस बहाने उन्होंने रचा ग्रंथ यह।
राम का काव्य सुन्दर, सुहावन यहां।






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, June 16, 2017

शीघ्र आ जाओ प्रिये

poem by Umesh chandra srivqastava 

शीघ्र आ जाओ प्रिये,
स्वागत तुम्हारा हम करें। 
ह्रदय स्थल में जो व्यापित ,
ताप को कुछ काम करें। 

वैसे फुर्सत कहाँ तुमको ,
काम की धुन में रमें। 
तेरे आने से मनों का,
भाव का पुट कम करें। 

तुम तो आते ही , ठहरते ,
हो कहाँ -इस वृष्टि में। 
दृष्टि से अवलोक करके ,
फुर्र हो जाते भले। 

पर समय जो तेरे आने से ,
हुआ निमग्न जो। 
उसको रूपों में बसाकर ,
आस की  डोरी धरें । 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivqastava 

Friday, June 2, 2017

बढ़ो धरा के अमर सपूतों-1

poem by Umesh chandra srivastava 

बढ़ो धरा के अमर सपूतों ,
युग फिर तुमसे मांगे है। 
भ्रष्ट तंत्र जो व्याप्त हुआ है ,
उसको तुम्हें हटाना है। 

कुर्सी पर बैठे जो बंधू ,
देश का सौदा करते हैं। 
अपने हित की बात वो करते ,
जनता को बहकाते हैं। 

बन जायेगा राम जो मंदिर ,
राम राज्य क्या आएगा !
रामायण घर-घर में वाचन ,
पर परिवर्तन आया क्या ?

वह जो मानस बने प्रवक्ता ,
उनको भी मुद्दा चहिये। 
कहिये बात सत्य नहीं है !
वह भी तो हैं रंगे हुए। (जारी कल )



 

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Thursday, June 1, 2017

मैं हूँ

poem by Umesh chandra srivastava

जब हमारे पास,
कुछ भी नहीं था ,
तब तुम थे।

आज हमारे पास ,
सब कुछ है ,
पर तुम नहीं हो।
बस यादें हैं ,
धड़कन है ,
और मैं हूँ।

मुझे याद है ,
जब तुम सोते में ,
मुझे जगा देते।
और अपने बाँहों का ,
फूलहार डाल,
मुझसे बतियाते ,
पुचकारते ,दुलारते ,
और प्यार करते।
कितना अच्छा लगता।
पर आज कहाँ रहा ,
वह सब।
जो तुम्हारे होने से ,
होता था।

अब कहाँ रही ,
वह प्रेम की टीस ,
जो तुम्हारे होने से ,
खिल उठता था।
अब तो पतझड़ है ,
अंगड़ाई है ,
देहं है ,
और मैं हूँ।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -










काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...