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Saturday, May 27, 2017

आकृति

poem by Umesh chandra srivastava 

सीलन  भरी दीवारों में ,
आज भी -
वह आकृति है।
जो तुमने ,
कीलों की नोक से -
बनाया था।
आज भी वह ,
भावों की आकृति ,
प्रतिक्षण ,प्रतिपल -
बदलते-बदलते ,
दृष्टि से दिखती है।
कभी राम नज़र आते हैं ,
तो कभी श्याम ,
तो कभी घनश्याम।
यह आकृति भी खूब है ,
भावों के प्रसांगिक ,
सोपान के लिए।






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

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