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Thursday, April 13, 2017

विमर्शों का दौर पुराना-2

poem by Umesh chandra srivastava

विमर्शों का दौर पुराना ,
अब आया भावों का दौर !

बिना साक्ष्य ,गूंगा बोलो -
कैसे नाम बताएगा।
वाह रे ! चिंतक !!
चिंतन धारा को ,
क्या तुमने रूप दिया ?

इस युग में निस्वार्थ की बातें ,
जैसे लगता सपना है !
सपने भी सच हो जाते हैं ,
गर वे स्वप्न सलोने हों !
वरना देखो-घूमो-फिरो  ,
कहाँ स्वप्न संभव होंगे !

वाह रे ! खूब चितेरक तुम तो ,
जन-मन के बादशाह बने।
रमे हुए जो तन-मन भीतर ,
उसका नाम जपो भाई।
बिंदु दिया है ,नया रूप है ,
गढ़-मढ़ लो आगंतुक हो।
हम सब सारे इस दुनिया में ,
केवल मात्र आगंतुक हैं !
जाना सबको-इस रण से है ,
एक न एक दिन आएगा।
मगर दृष्टि -जो देके गया है ,
वही वृष्टि ही पायेगा।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

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