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Monday, March 6, 2017

काश ! कविता के दो पैर होते

poem by Umesh chandra srivastava 

काश ! कविता के दो पैर होते ,
और वह सड़क की धारा को, 
माप कर चल पाती। 
काश !  कविता के दो हाथ होते ,
जो सड़क पर अनियंत्रित वाहनों को ,
अपने हाथों से ढकेल पाती। 
काश ! कविता की दो ऑंखें होती ,
जो सड़क पर अनियंत्रित लोगों को ,
घूर सकती। 
काश ! कविता की नाशिका होती ,
जो सड़क की सड़ांध ,बदबुओं को ,
करीने से महसूस कर पाती। 
काश !कविता के पास होती ,
श्रवण शक्ति ,
जो सड़क की चिल्ल-पों सुन पाती। 
लेकिन क्या किया जाये ?
अब तो कविता-
बिन हाथ ,पैर ,आँख ,कान के हो गयी। 
जो मन चाहा ,लिख दिया। 
सन्दर्भ-व्याख्या-क्या पता ?
रजाई में दुबक कर लिख डाली ,
अँधेरे की कविता। 
नदी में डुबकी लगा ,
लिख डाली रोमानिया की सविता। 
कहाँ रहे अब वह बिम्ब , प्रतिमान ,
जो समाज को झकझोरे। 
कहाँ रहा वह अडिग स्वर ,
जो अडिग योद्धा सा खड़ा हो। 
सबकुछ गड्डम-गड्ड। 
लिख दिया कुछ हँसाने के लिए ,
भीड़ जुटाने के लिए। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

4 comments:

  1. बहुत खूब आदरणीय कविवर्। इसमें एक बात और लिख दीजिये जितने पढ़ने वाले नही उतने लिखने वाले हो गए। देखें तो भाषा बढ़ रही है पर कविता अपना स्वरूप गँवा विद्रपता की ओर बढ़ रही है। सार्थक रचना। हार्दिक शुभकामनाएं।

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  2. कविता के हाथ पैर मुँह कान सब होते हैं परंतु समाज ही संवेदनहीन होता जा रहा शायद इसलिए कवि के सारे भाव शाब्दिक ढेर हो रहे हैं।
    अंतर्मन को झकझोरती कविता।
    सादर।

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  3. काश कविता के दो हाथ होते
    जो सड़क पर अनियंत्रित वाहनों को अपने हाथों से ढकेल पाते
    काश कविता की श्रवणशक्ति होती
    बेहतरीन विचारत्मक प्रस्तुति

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