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Wednesday, February 8, 2017

दुःख की रजनी बीत चली है


दुःख की रजनी बीत चली है ,
अब तो नया नवेरा है।
नवल प्रभात का सुन्दर देखो ,
कैसा सुखद सवेरा है।

पंछी कलरव दूर गगन में ,
धरती पर हरियाली है।
दूर गगन से अंशुमाली ,
कितनी छटा निराली है।

गंग नदी पर पाहुन आये ,
रोली , चन्दन, अक्षतयुक्त।
वह देखो अटखेली करता,
नन्हा-मुन्ना गोदों में।

कितनी मधुर सुखद बेला है ,
यहां-वहां सब खुशियाली।
बालू की है रेत उड़ रही,
देखो छटा विराली है।

धरती कितनी लगती प्यारी ,
सुबह पहर की बेला अद्भुत।
सुबह-सुबह जो काम हुआ तो ,
समझो दिवस मनोहर होगा।

ईश्वर का अविराम यहाँ है ,
वह देखो मुस्काती बदली।
अपनी अदा बिखेरी है ,
सुन्दर , रम्य ,मनोहर पावन।
पवनों का भी डेरा है।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

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