month vise

Monday, February 13, 2017

प्रेम के देवता

poem by Umesh chandra srivastava

प्रेम के देवता ,तेरा दर्शन तो हो,
मैं ह्रदय ज्योति मन में जला के रहूँ।
तुम कहो-रूप का यह जो दर्पण मेरा ,
उसको तुम पर ही केवल लुटा के रहूँ।
आज फिर तो बजी बांसुरी मन मेरे ,
तुम तो कन्हा बनो ,मैं तो राधा रहूँ।
फिर चले दौर वह-जहाँ प्रेम नगर ,
उस भवन में ,तेरी बन के साधक रहूँ।
तुम कहो बात क्या ,वो जो तारा दिखा ,
उसको तोड़ जमीं पे दिखा के रहूँ।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

3 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 01 अप्रैल 2017 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
    

    ReplyDelete
  2. सुंदर चित्रण। आभार

    ReplyDelete

जो गया सब उसके ही खातिर

A poem of Umesh chandra srivastava  जो गया सब उसके ही खातिर , रो रहे-चिल्ला रहे।  जमीं पर रखी है मिट्टी , बोलते-बतिया रहे।   ...