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Tuesday, January 31, 2017

तुम बतलाओ प्रेम की डोरी


तुम बतलाओ प्रेम की डोरी ,
कहाँ से जाए कहाँ तलक ।
क्यों अम्बर से तारा टूटे ,
क्यों बातें हों फ़लक़-तलक़ ।

रूहानी मौसम में बोलो ,
कहाँ मिलेगी अलक-पलक ।
सब बातें हैं दुनिया में तो ,
किस्सा-कहानी अलट -पलट ।

मुरीदी सब उसके बोलो ,
मुख से मत कुछ बात कहो ।
रहना सहना यही जगत में ,
उससे मत दो हाथ करो ।

वह तो बौराया है पंछी ,
सभी को देखे उलक-पुलक ।
ऐसे ही लोगों की दुनिया में ,
फ़रमाइश अटक-पटक ।



उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -

Monday, January 30, 2017


प्रश्न-
बाबुल तेरे घर की बिटिया मैं ,
मेरी ही बिदाई क्यों करते।
बेटों को घर में ही रखते ,
बेटी को कहे पराया धन,
समझे -बरसों से - ही करते ,
अब आया है यह युग बाबुल।
फिर भी तुम -पुराने क्यों बनते।
हर ओर बराबर की बातें,
इस मूल बात पर क्यों खिसके ?
मैं रोती नहीं बस कहती बाबुल,
मेरा भी हक़ तेरे चौखट पे।
बेखटके बेटे क्यों रहते ?
बेटी की विदाई क्यों करते ?
उत्तर-
बेटी तुम कहती ठीक मगर ,
दुनियादारी भी कुछ होती।
जो रीति- रिवाज चले आये ,
उनको कैसे मैं तोडूंगा।
तुम बात सही कहती बेटी ,
मैं इस बिंदु पर सोचूंगा।
अपने सब भाई-कुटुंब से ,
धर्मों के धर्म धुरंधर से,
सबसे मैं प्रश्न यह पूछूँगा।
बेटी तुम मेरी प्राण सही,
'विमर्श' दिया मैं सोचूंगा।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Sunday, January 29, 2017

यह संगम त्रिवेणी है


यह धरती ,यह प्रयाग-यह संगम त्रिवेणी है। 
जहँ पर लगा है मेला -श्रद्धा की पुंज का। 
आये हैं भक्त कितने -आस्था से मगन हो। 
यहँ पर बसेरा माघ का-उत्सव का पर्व है। 
देखो है सन्त जमघट-तम्बू का शहर है। 
आते यहाँ निरंतर -देशों से लोग भी। 
परसन यहाँ पे होता-मानव के पुंज का। 
श्रद्धा से नत हुए हैं-सभी प्रेम से यहाँ। 
रहते हैं ,कर रहें हैं -निज शुद्ध आत्मा। 
उनको भरोसा है यहाँ-सब पाप कटेंगे। 
नित प्रात उठ इसी से-वो गंगा नहाते हैं। 
जीवन तो सफल हैं यहाँ ,सब पुण्य पाते हैं। 
देते हैं दान जी भर ,संचित है जो किया। 
अंतिम दिवस रवानगी का-है बहुत सुखद। 
करते हैं दीपदान ,गोदान-बहुत कुछ। 
माँ गंग को नवां के शीश-घर वो चल दिए। 
दुनिया की बात में रमें ,फिर जी रहे वहां। 
मेला है माघ का या जीवन का खेल है। 
ऐसे ही चलता जीवन ,मेला का मेल है।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Saturday, January 28, 2017

सपनों के सौदागर आये


सपनों के सौदागर आये ,सपने बेच रहे हैं। 
हम सब सीधे परिंदे ठहरे ,उनको देख रहें हैं। 
वह बहलाते , वह फुसलाते ,हमको खूब रिझाते हैं। 
कहते हैं जन हमको प्यारे , हम जन-जन के हैं न्यारे। 
लोग ज़रा आगे बढ़ पूछो-कौन कला के मालिक वो। 
मौका पड़ता रो देते हैं ,तन्हा में गाली देते। 
मुखड़ा उनका विविध रूप है ,सहमें या  डर जायें  हम। 
आके कहते हमने तुमको ,नई दिशाएं ही दी हैं। 
कौन दिशा की भटकन बेला ,यह तो उनकी कला-कला। 
आज गए तो फिर आएंगे ,सपनों का गुच्छा लेकर। 
मत भरमों इन कला-कला पर,ये तो केवल सौदागर। 
सौदा करने ये आएं हैं ,सपने छलने ये आये। 
इनपे कभी भरोसा बंधू ,नहीं -नहीं तुम न करना। 
वरना छलिया छल जायेंगे ,तेरे सब अरमानों को। 
अपनी ढपली ,अपनी रागें ,अपनी बात सराहेंगे। 
दूजे को नीचा दिखलाकर अपना ताली बजायेंगे। 
अब तुम निर्णय खुद ही कर लो ,सपने तो रह जायेंगे। 
लूट भगेंगे ऐसे परिंदे , कुर्सी पे इतरायेंगे। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, January 27, 2017

लिखते रहोगे बात अपने आप बनेगी


लिखते रहोगे बात अपने आप बनेगी ,
कुछ शब्द बुनावट कुछ छंद-वंद सब।
लय में खिलेगा बिम्ब मुस्कान तनेगी,
क्या भाव हैं विचार सभी निखर के निकले।
बिम्बों के धरा पर पूरी सौगात बनेगी ,
कबीरा के भाव देख लो तुलसी को निहारो।
मीरा की तान में न सही राधा की रागिनी ,
बस साधना रत हो खुदी कविता ही खिलेगी।
माँ के गर्भ से तो कोई-सीख कर नहीं आता ,
जीवन के अनुभवों से-वह गीत छनेगी।
आओ विचार कर लें सभी मिल बैठ कर यहाँ ,
कृष्णा ,रहीम-राम की सुध आप बनेगी।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Thursday, January 26, 2017

धानी चुनरी ओढ़ खड़ी है ,यह तो भारत माता है-2

धानी चुनरी ओढ़ खड़ी है ,यह तो भारत माता है। 
हम सब इसी के छत्र-छाँव में ,यही हमें तो भाता है। 

मत अब होने दो ऐसा ,जनता ही सिर्फ मिमियाए। 
उनको बोलो वो भी खोले ,चन्दा कहाँ से आता। 
सारी  ढुल-मुल सारी बातें ,अब तो नहीं चलेगी भाई। 
तुम बनते हो देश हितैषी, तो अपना राज भी खोलो। 
जनता को मूक बधिर क्यों समझे ,कुछ अब तो बोलो ?
यह लोकतंत्र का हिस्सा ,तुमको भी जवाब है देना। 
औने-पौने बातों में,जनता को मत भरमाना। 
तुम आये अभी हो भइया ,जनता से मुखातिब हो तुम। 
वरना फिर पाँच बरस तक ,तुम मनमानी ही करना। 
अब नहीं चलेगा ऐसा ,पैसे की माया पैसा। 
कुछ तो तुम शरम करो अब  ,बोलो-बोलो मेरे भइया। 
कुछ देश के हित में खोलो ,कुछ अपना ह्रदय टटोलो।
वरना तुमको जनता भी ,औने-पौने कर देगी। 
तब बैठ के राग अलपना ,क्या खोया क्या है सपना !







उमेस चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, January 25, 2017

धानी चुनरी ओढ़ खड़ी है ,यह तो भारत माता है-1

धानी चुनरी ओढ़ खड़ी है ,यह तो  भारत माता है।
हम  सब इसी के छत्र-छावँ मे,यही हमे तो भाता है।
इसने कितने झंझा झेले , तूफानों को ठेला है।
तब  कहीं जाकर माता ने बच्चों से यह बोला है।
तुम सब मेरे हो बच्चे ,तुम बनों प्यार के सच्चे।
मत डरो पुत्र तुम अपना ,हक़ के खातिर लड़ जाओ।
आएंगे कितने झोंके ,जो तुम्हें मार्ग से रोकें।
तुम मत पड़ना झोकों में ,बस अपना काम सांवरो ।
कहने को लोग कहेंगे ,तुम बौराये ,अनपढ़ हो।
मत झिझक के बातें करना ,तुम स्वतन्त्र भारतीय ठहरे।
कहने दो तुम उनको भी ,वह चाहे जो भी समझें।
पर हम सब को है दिखाना ,तुम पूछ करो ही सबकुछ।
ऐसा न होने पाए ,जनता सवाल -उत्तर दे ।
वह बैठ कुर्सी पर ऐठे ,बैठे ही हुकुम चलाएं।
उनसे पूछो तुम भाई -वह अपना कुनबा खोले।
जनता से पूछें पैसा -अपने में दांव को खेलें।


शेष कल...... 

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Tuesday, January 24, 2017

तुम्हें नाम क्या दूँ ,मैं पूछूँ सवाल


तुम्हें नाम क्या दूँ ,मैं पूछूँ सवाल ,
तुम तो जहाँ में बनी बेमिसाल।
किताबों में दिखती हो, तुम भी कमाल ,
आओ हकीकत , करूँ  कुछ दीदार।
नहीं बात कोई , ना कुछ है सवाल ,
तुम हो दिलों में ,तुम्हारी खुमार।
वो कहतें हैं तुम तो हो दुनिया की जीस्त ,
तुम्हीं पर न्योछावर ,तुम्हीं पर बवाल।
कहें क्या खुदा से, बनाया  है खूब ,
तुम तो जहाँ की , कमलदल खिजाब।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Monday, January 23, 2017

तुम्हारी नज़रों से ही है मिलता


तुम्हारी नज़रों से ही है मिलता,
पूरे जहाँ की ख़ुशी, मोहब्बत । 
तुम्हारी नज़रों से हमने देखा,
चंदा 'औ' सूरज  सभी नज़ारे।
ज़हाँ के दर्दों-ग़मों को देखा ,
ग़ुरबत में लोगो को सीते देखा।
गंगा-जमुनी के सब नज़ारे ,
नहीं है कोई भी यह फलसफा।
जीवन की सब कुछ,सभी सच्चाई ,
वो भी है मंज़र ,ये भी है बातें।
सभी को हमने नज़र से देखा ,
तुम्ही बताओ क्या कुछ है जादू ?
तुम्हारी नज़रें तो हैं पैगम्बर ,
इसी में मैंने दिगंबर देखा।
तुम्हीं बताओ कि तुम बला क्या,
सारे जहाँ का सुकूँ है मिलता।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -


Sunday, January 22, 2017

मोहब्बत की हद तो बताओ कहाँ तक

मोहब्बत की हद तो बताओ कहाँ तक ,
निगाहें तो चलती हैं जायें जहाँ तक।      
वो गेसू जो बिखरे ,नज़ाकत है कुछ तो ,      
नज़र तो चलाती ,बताओ कहाँ तक। 
यह मुखड़ा तो दर्पण है झीना सा परदा ,
बताओ ज़रा हम उठायें कहाँ तक। 
चलो बात छोड़ो तुम आओ तो बैठो ,
 मैं देखूं  तुम्हें अब ,कहाँ से कहाँ तक। 
वो शीरी बयानी ,वो उल्फ़त की बातें ,
बताओ ज़रा शब्द वह है कहाँ तक। 
क्या मीरा की सीमा या राधा की बातें ,
किया था उन्होंने ,वह हद थी कहाँ तक। 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Saturday, January 21, 2017

कुछ समझौते करने पड़ते -3

जिनको सत्य बताना था वो ,
मुहकी मार चले ,जा बैठे। 
हृदयों को आघात मिला है ,
पर दुनिया तो चलती ऐसे। 

कुछ कहना ,कुछ भी सुनना क्या ?
अब आदत में धरना होगा। 
बड़े मुखौटे इधर-उधर से ,
बहु बातें ,कह अब जाते हैं। 

वह तो फंसा परिंदा ठहरा ,
अब तो उसको सुनना होगा। 
जीवन की उस चक्र धुरी तक ,
आहत रहके जीना होगा। 

बैठे बहुत हितैषी अब भी ,
कहते हैं हम साथ-साथ हैं। 
मगर वक्त पर मुकरे लगते ,
ऐसे में वे कैसे अपने। 

बात यहीं पर ,अब रुकता हूँ ,
दुनियावी बातें सुनता हूँ। 
सत्य आवरण  खोलेगा ही ,
तब निर्णायक आहत होंगे। 

निर्णय देना सरल काम है !
यह निर्णय दाता ही जाने। 
थोड़ा कुछ तो भरम हुआ था ,
लेकिन अब निष्ठा है उनपर। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, January 20, 2017

कुछ समझौते करने पड़ते-2

सत्य आवरण खोल न पाया ,
यह सब है इस युग की माया। 
धर्म धुरंधर ,धर्म प्रदर्शक ,
अपनी वाणी खोल ,हैं बढ़ते। 

उसपर क्या बीती क्या जाने ,
वह तो अपने में खुश होकर। 
हुंकारों की ज्योति गढ़ेंगे ,
अगला मर जाये या कुछ भी ,
उनको फ़िक्र कहाँ है इसकी। 

माना गलत हुई कुछ बातें ,
पर यह मौखिकता के बल पर। 
लेकिन वह भी-समझें कुछ तो ,
मौखिक कौल दिला डाला है। 

खैर ,नहीं अब कुछ भी कहना ,
समरथ को हम क्या कह सकते ?
गुण 'औ' दोष कहाँ परिपाटी ,
सब कुछ अब तो गड्ड मड्ड है। 




शेष कल..........
उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Thursday, January 19, 2017

कुछ समझौते करने पड़ते-1

कुछ समझौते करने पड़ते ,
मुख से निकल गयी कुछ बातें,
उसको अमल में धरने पड़ते। 

हालातों के समय चक्र में ,
कई मुखौटे दिख जाते हैं। 
किसको अपना कहें ,बेगाना ,
सब तो बात पे अड़ जाते हैं। 

वह जो निर्णायक बन बैठे ,
उनको भी सब पता नहीं है। 
बतलाते केवल वह हैसियत,
अपना क्या हैं  ,चुप रहते हैं?

 समय चक्र की धुरी बिंदु पर ,
हालातों से सब हैं खिसकते। 
किएको अपना माने यहाँ पर ,
सब तो चतुर परिंदे निकले। 

चलिए अब क्या जो होना था ?
होकर वह अब सफल हुआ है। 
वह तो अपना अहम् भरेंगे ,
हम रिरियाते घूमे ऐसे। 




                                                                                                                                              .........शेष कल 
उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, January 18, 2017

तुम जब आती मन के भीतर

तुम जब आती मन के भीतर ,
भाव जगा ,जग जाता है। 
बौराये मन में तब थोड़ा ,
बहुत संतुलन आता है। 
तेरे आने की आहट तो,
न जाने कैसे हो जाती। 
तू तो बसती ह्रदय पटल के ,
भीतर उस गलियारे में। 
जहाँ पे केवल प्रभु अर्पण है ,
और नहीं कुछ है दूजा। 
न जाने यह सूखा मौसम ,
कैसे हो जाता गुलजार। 
तू जब आती मन की तलैया ,
कम्पन-कम्पित हो जाता । 
तुम तो मधुर सुहावन बदली ,
जब आती छा जाती हो। 
बरबस मेरे मन दर्पण में ,
रास हिलोरे लेता है। 
न जाने उसकी भी महिमा ,
कितनी सुदृण सुहानी है। 
जब भी मिलते दो-दो प्राणी ,
नयी कहानी बन जाती। 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Tuesday, January 17, 2017

भ्रात प्रेम का नया समर्पण

भ्रात प्रेम का नया समर्पण ,
पुत्र विरासत ही पाता है।
गर यह काम खुदी कर देते ,
भ्रात दृष्टि में दोषी होते।

किया पैतरा अद्भुत भइया ,
माना राजनीती के पंडित।
खण्ड-खण्ड कुछ नहीं हुआ भी ,
फिर भी राजतिलक वह पाया।

अब तो दोनों हाथ में लड्डू ,
भ्रात प्रेम पर अविरल वाणी।
पुत्र विरासत खुद ले बैठा ,
क्या अब करें ,दुखी हैं  भाई?

अब जो कहो ,करें हम आगे ,
धागे रक्त के शाश्वत होते।
भ्रात प्रेम की सीमा हद तक ,
टुक-टुक देखें 'औ' करें क्या ?

अब बतलाओ जुगती क्या है ?
कैसे नैया पार लगेगी।
आखिर पुत्र ,पुत्र ही होता ,
पर तुम भाई परम् प्रिय हो।

तुम्हें समर्पण भ्रात प्रेम है ,
सब न्योछावर भ्रात प्रेम है।
हक-हुकूक सब चला गया अब ,
वामप्रस्थ का मार्ग धरें हम !






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Monday, January 16, 2017

चिंतन गर शब्दों पर होगा ,

चिंतन गर शब्दों पर होगा ,
नए अर्थ का होगा विस्तार । 
अनुजा ,तनुजा ,सुगम ,संगत ,
सबका अपना-अपना तार। 
दृष्टि नयी देता है शब्द ही ,
गर तुम गौर से चिंतन कर लो। 
शब्द पड़े तमाम सागर में ,
गागर ,सागर अर्थ निकालो। 
एक शब्द है 'दुर्गति' यारों ,
स्त्रीलिंग यह शब्द रहा। 
ध्यान करो ,संकेत मिलेगा ,
अपने संयम को पहचानो। 
जिसने भी यह किया प्रयोग ,
वह तुमको देता है ऊर्जा। 
पुरुष रहो तुम ,पुरुष बनो ही ,
अपना बुद्धि, विवेक धरो। 
अर्थ-अर्थ में ,अर्थ न समझो ,
उसको समुचित कर विस्तार। 
अपनी निजता को सँवारो ,
बन जाओ तुम जग उद्धार। 
अब तुम बन के जग उद्धारक ,
दृष्टि नई 'औ' सोच को दो। 
जीवन सफल रहेगा हरदम ,
पर तुम शब्द पर गौर करो।  




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Sunday, January 15, 2017

फूल मन दर्पण देखे

फूल मन दर्पण देखे ,
विहँसे सब संसार। 
आकुल-व्याकुल के बनो ,
आप सदा पतवार। 
       ***

जीवन तो केवल रहा ,
संघर्षों का छोर। 
जिसने इसको जी लिया ,
वही बना जग भोर। 
      ***

अपना तो बस ध्यान है ,
कहाँ-कहाँ जगदीश। 
जीवा जंतु सब  जड़ों में ,
उनका सदा निवास। 
       ***

आज ख़ुशी काट जाये तो ,
कल भी है इशरत। 
जीवन के इस राह में ,
कहाँ मिले  फुरसत। 
        ***

आप कहें 'औ' हम कहें ,
यह जग अच्छा होये। 
समवेत प्रयास  से ,
बात बने सब कोय। 
       ***




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, January 13, 2017

तुम कहानी कहो-हम सुने रात भर

तुम कहानी कहो-हम सुने रात भर, 
उसमे सच्ची ही बातें ,प्रमाणित रहें। 
कुछ रवानी रहे, कुछ रहे स्वप्न भी ,
क्योकि जीवन भी चलता इसी छोर पर। 
उसमें नगमें भी हों 'औ' वफाई भी हो ,
वैसे जग में सच्चाई का ही मोल है। 
सब तो बातें करें ,काम निज मन का ही ,
इस तरह के तो जीवन का क्या फायदा ?
सब रहे कायदा ,कुछ न हो फायदा ,
तो बताओ रहा फिर यहाँ मोल क्या?
वह जो स्वामी रहे ,धर्म की बात पर,
पूरा जीवन ही अपना खपा कर दिया। 
हम तो गृहणी बने ,अब तुम्हीं कुछ कहो ,
मेरे गृहणी का मोल करो कुछ ज़रा। 
बात सच है मगर ,कुछ इधर भी करो ,
पास आते नहीं , दूर से बस कहा-
तुम तो प्रियतम हमारे -हमी तुम तो हैं।  
ऐसी बातों का उसमें सहजपन भी हो। 
एक रानी  रही ,एक राजा रहा,
यह कहानी तो सदियों पुरानी हुई। 
कुछ नई ही कहानी ,सुनाओ जरा ,
जिसमें दुष्यंत भी हों 'औ' शकुंतला भी हो। 
राम-सीता रमे, कृष्ण-राधा जमे ,
बात मीरा की केवल निशानी न हो। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Thursday, January 12, 2017

क्यों उदास रहता है तन-मन

क्यों उदास रहता है तन-मन ,
तुम बिन सखी अधूरा जीवन। 
भावों के इस मन-सागर में,
छम-छम ,रुन-झुन ,कोई न धुन। 
ऐसे में सखि जीवन केवल ,
किसी तपस्वी सा ही लगता। 
तप ,जीवन को तपा-तपा कर ,
क्या दुनियावी बातें होंगी। 
तुम जब साथ नहीं हो भोली ,
रात-दिवस सब पानी-पानी। 





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, January 11, 2017

मिलते रहोगे कुछ तो बात बनेगी

मिलते रहोगे कुछ तो बात बनेगी ,
दो दिल मिलेंगे,कुछ तो सौगात बनेगी।
वारना तो दूर -दूर से कुछ नहीं होता ,
तुम पास रहोगी तो सब बात बनेगी।
देखो गगन में दूर सितारे हैं चल रहे ,
आपस में भले दूर ,पर है प्यार मुकम्मल।
कुछ इस तरह से हम भी थोड़ा साथ तो रहें,
देखो मिलन से ही तो कायनात बनेगी।


Tuesday, January 10, 2017

छिटक चांदनी बेला में,गंगा के तट पास खड़ी। 
सुदृढ़ बदन की अटखेली में ,सब कुछ सहज-सहज दिखा। 
प्राची ओर किये मुख करके ,खड़ी रही योगी मुद्रा। 
जैसे लगता वह चकोर बन ,चन्दा को निहार रही। 
मगर उधर बदल राग में ,चन्दा की अटखेली है। 
पछुआ से थोड़ी बयार का ,झोका थोड़ा मध्यम था। 
लेकिन स्थिर खड़ी रही वह ,एकटक चन्दा देख रही।  
शायद वसुधा वाले चन्दा ने ,उसको कुछ दर्द दिए। 
अवचेतन मन की पीड़ा से ,वह सुध-बुध सब खोये रही। 
मगर टीस कुछ-कुछ रुक आती,एक पथिक था देख रहा। 
बढ़ा,कहा-बोला धीरे से ,क्यों आतुर हो मन मारे ?
पलटी सहज हुई 'औ' बोली-प्रीतम मेरे बौराये। 
कहती थी तुम चन्दा ला दो ,वह बोले चन्दा को देखो। 
इसीसलिए मैं एकटक होकर चन्दा को निहार रही। 
खड़ा पथिक धीरे से बोला-चन्दा तो निर्मोही है। 
कितना उसे चकोर चाहती ,पर वह अपने धुन में है। 
उसी तरह से पुरुष सभी हैं ,अपनी धुन में ही रहते। 
कहाँ हो भटकी, जाओ यहाँ से ,सर्दमयी यह मौसम है। 






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
  

Monday, January 9, 2017

अग्निशिखा की तरुणाई

सुध-बुध रात बहुत थी आयी ,
भोर भये सब पंख उड़े। 
निशा पहर की सौगातों में ,
मुखड़ा खिला-खिला देखा। 
भोर भयी तो सब कुछ बिखरा ,
सारी रात रही तनहाई । 
तुम भी तो निर्मोही ऐसे ,
दिन में फुर्र ,रात को आते। 
दिवस पहर में व्यस्त रहे हम ,
रात में रहती तनहाई । 
तनहा जीवन ,तनहा हम हैं ,
तुमने तो कुछ समझा नहीं। 
सोचा गर होता भी थोड़ा ,
तो तुम यूं कैसे जाते?
तुम तो सजन बड़े बेदर्दी ,
तन को व्याकुल छोड़ गए। 
बोलो कब-तक सुध लोगे तुम ,
अब तो शीतमयी मौसम। 
आओ जल्दी कुछ तो कम हो ,
अग्निशिखा की तरुणाई। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Sunday, January 8, 2017

मन्द-मन्द चले पुरवाई

मन्द-मन्द चले पुरवाई ,
मन अंदर से उमड़े छंद।
नन्द किशोर ठुमुक ठुम नाचैं ,
तन-मन हो जाये अनंद।
मुरलीधाम अधर पट बिहंसै ,
नयनन से बरसे गुलमंद।
तिलक ललाट पे अतिशोभित हो ,
पांव पैजनिया छम-छम-छम।
यशोदा नाचैं ,देवकी झूमैं ,
सखियाँ ,गोप भये स्वच्छंद।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Saturday, January 7, 2017

बुद्धि विलासी इस कविता में

बुद्धि विलासी इस कविता में ,
श्रद्धा का है भाव कहाँ ?
वह तो तना खड़ा है पौधा ,
उसमें रुनझुन ,त्रास कहाँ ?
वह तो आज की समतल नारी ,
प्रेम तत्व का राग कहाँ ?
बनी प्रोफेशनल आज की नारी ,
उसमे वह अनुराग कहाँ ?
फट-फट दौड़े ,झट-पट निपटे ,
उसमे धैर्य का भाव कहाँ ?
रोज सवेरे चाय की प्याली ,
नयनों में सपनों की बुनावट ,
ह्रदयवाद की गहराई में ,
डूबे कहाँ ,बुद्धि के बल पर ,
जोड़ -तोड़ की जुगती पाले ,
दौड़ रही है यहाँ-वहां ?
इसीलिए राहों में मिलते ,
दोहन करने वाले बहुत।
कहाँ-कहाँ की बात बताऊँ ,
सब तो यहाँ गड्डम-गड्ड !






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, January 6, 2017

अपना भारत देश है प्यारा

अपना भारत देश है प्यारा ,
बुलंद होगा जन-मन का नारा। 
लोकतंत्र की मर्यादा है ,
इसका हम सम्मान करें। 
जो भी बनी व्यवस्थाएं हैं ,
उस पर हम अभिमान करें। 
लोकतंत्र के सफल पहरुओं ,
तुम पर सब कुछ निर्भर है। 
चाहे मर्यादा को बनाओ ,
या खंडित कर तार करो। 
लाठी तुम्हारी,भैंस तुम्हारी ,
जो भी चाहे कर लो तुम। 
पर जनता तो देख रही है ,
आपा में रहना हरदम। 
पांच वर्ष में हुई जो चर्चा ,
जनता ने भी झेली है। 
अब थोड़ा सा मर्म की बातें ,
जनता जानिब करते हो। 
माना साल तुम्हारा बीता ,
अपना काम गिनाओ तुम। 
पर जनता को झूठी तसल्ली ,
मत दो ,सत्य बताओ तुम। 
पांच वर्ष तक गूंगी बहरी ,
जनता को समझा तुमने। 
अब तो निर्णय जनता देगी ,
थोड़ा सा कुछ शर्म करो। 
अपनी लड़ाई ,अपनी बड़ाई में ,
झूमे तुम तो सालो तक। 
अब मत झूठी बात न कहना ,
जनता निर्णय देगी अब। 








उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, January 4, 2017

माना कुछ हक़ देकर मैंने

माना कुछ हक़ देकर मैंने,
न कोई अपराध किया।
पर वह बिहसे ,मन ही मन में ,
सपनों का संसार रचा। 
उनके मन में क्या बातें हैं ,
मैं तो कुछ भी न जानूँ ?
मैंने तो अपनाया उनको ,
वह क्या जुड़ पाए हमसे। 
मौखिक बातों में तो-उनने ,
हमें बड़ा अपना माना। 
पर क्या हक़ीक़त में भी-उनने ,
हमें बसाया मन भीतर। 
यह तो बात समय आने पर ,
खुद ही खुद खुल जाएगी। 
मैं तो बौराया मन ठहरा ,
बहुत गए ,ये भी लूटें। 
पर मैंने दृढ़ता से सारे ,
बात,संकल्प किये हैं तय। 
उनके मन में क्या संकल्पित ?
वो जाने 'औ' वह जाने। 
मेरे मन में श्याम पटों का ,
कोई भी तो धुआं नहीं। 
क्या उनके मन में भी ऐसा ,
भाव जगा-यह वो जाने ?



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Tuesday, January 3, 2017

बचपन में अबोध रही जब

बचपन में अबोध रही जब,
पिता हमारे दुलराते। 
कहते-प्यारी-प्यारी बिटिया ,
तू तो साँस बनी मेरी। 
कल अपने से विलग करूंगा ,
मन तो बोझिल होगा ही। 
आज पता नहीं ,वह तो मुझसे-
बात कहाँ ,देखते नहीं !
मैंने सोचा निज मन भीतर ,
कौन गलत जो बात हुई। 
मेरे पिता -मेरे जन्मदाता ,
मुझसे दूरी करे हुए। 
'प्रेम' करना गर बुरा काम है ,
तो फिर प्रेम की महिमा क्यों?
क्या राधा ने, क्या मीरा ने ,
या सुभद्रा 'औ' रुक्मणी ने भी ,
प्रेम किया था इस जग में ?
उनसे कोई अलग नहीं है ,
फिर क्यों-अब होती बातें ?
क्या हो सुखद , अगर सब कोई ,
प्रेम शब्द को अपनाएं। 







उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Monday, January 2, 2017

नव नूतन की देके बधाई

नव नूतन की देके बधाई ,
उसने कुछ मनुहार किया। 
जैसे उंगली से गालों पर ,
उसने थोड़ा वार किया। 
मन के तार हुए तरंगित ,
मन में कोई भाव जगा। 
पर दुनिया की लाचारी में ,
दोनों एकदम संयत थे। 
भीतर में जो प्रेम फुटा था,
उसको भीतर में रक्खा। 
फिर दोनों उठ खड़े हुए यूँ ,
चले गए निज राहों पर। 
पर जब घर पहुंचे वह दोनों ,
अंकुर फूटा  प्रेमों का। 
अकुलाय मन ,बौराया तन ,
पर सब कुछ था सधा-सधा। 
                  नव नूतन की देके बधाई ,
                  उसने कुछ मनुहार किया। 
 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -  

Sunday, January 1, 2017

मानवता का बीज मिले ,गर

मानवता का बीज मिले ,गर,
सबको मैं तो दे डालूँ। 
कहूँ-उसी का फल खाओ तुम ,
और उसी सा बन जाओ। 
शपथ-वपथ का कोई मतलब, 
तब तो नहीं सताएगा। 
सीधे तन कर चलो सड़क पर ,
गलियों का तब काम कहाँ। 
इधर-उधर न कोई भटकन ,
केवल बस अविराम यहाँ।
सुख के बादल रहें हमेशा ,
खर-पतवार का दंश नहीं। 
केवल मुक्ता नीर बहे बस ,
प्रेम भाव का फूल खिले। 
फूलों के दर्पण में महके -
मुख मंडल 'औ' रूप यहाँ। 
सुधियों की बातों में ,सुध हो ,
रह जाये मुस्कान यहाँ। 
         मानवता का बीज मिले ,गर,
         सबको मैं तो दे डालूँ। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-

दीप का पर्व सबको , मुबारक यहाँ।

poem by Umesh chandra srivastava  दीप का पर्व सबको , मुबारक यहाँ।  सत्य की ज्योति , हरदम ही जलती रहे।  सत्य ही है वही , सबका...