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Monday, August 29, 2016

सनम

धूल, कांटो से तुमको बचाया सनम,
तुम गए तो गए, सीढ़ियों की वजह।  
सर्द थी वह सुबह, कोई रौनक न थी,
हाँथ पकडे चली थी डगर ही डगर। 
कौन पल था, जो छूटा करो से वह कर,
तुम गिरी धम्म से, लहू लुहान हो गयी। 
भीड़ ने कुछ मदद की नही थी मगर, 
मैं तो तुमको तो बस देखता रह गया। 
तेरी हिम्मत की दाद बहुत थी सनम,
तुमने खंज्जर चुभाया चली ही गयी। 
मैं तो रोता रहा सिसकियाँ रोक कर,
बाल-बच्चो की मुझ पर ही जिम्मेवारी है। 
तुम जहां भी रहो, वहां खुश ही रहो, 
मैंने तनहा सफर का मज़ा ले लिया। 
है मज़ा या सजा मुझको भाता नही,
तुम बिना घर, अब सूना ही सूना रहा।  
                                                         उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

Sunday, August 28, 2016

राम नाम हरी नाम

सुबह-सबेरे राम नाम हरी नाम जपोगे  कब तक।
दिन भर दोहन करते रहते क्या तुम ?
राम-नाम जपने का मतलब-सत्य डगर है प्राणी।
सत्य मार्ग पर चलो ,नारायण की है ऐसी वाणी।
मिथ्या जाप करोगे , कुछ भी नहीं मिलेगा।
नर तन पाया व्यर्थ में-इसको मत गवां मेरे भाई।
पाया है जो नर तन प्यारे सुध-बुध रखो संयत।
लोगों  का खूब भला करो तुम , यही जगत  की थाती।
वार्ना घूमों फिरो व्यर्थ में , अपावन तुम बनकर।
भोग के खातिर मत तुम जियो ,योग के खातिर जियो।
गीता का उपदेश यही है, सत्यासत ही जियो।
नाहक में तुम स्वांग रचा  कर , प्यारे मत तुम भटको।
जीवन सुखद ,सार्थक होगा जब तुम सत्य धरो गे।
लोक हितों के लिए मरो तुम, प्राणी विनय हमारी।  

Saturday, August 27, 2016

कर्मो का बंधन।

कर्मो का बंधन। 
कर्मो के बंधन है, जीवन यह सारा। 
भाग्य-वाग्य  कुछ नहीं, बेतुक की बातें ।
बहस-वहस मत करो ,कायर तुम जानो ।
गीता का उपदेश , सत्य  को पहचानो ।
मोहत्याग, धर्मनिष्ठ महिमा पहचानो ।
राम रहे कर्म रत,कृष्णा योगी सत्य है ।
उनकी मीमांसा  कर सत्य पहचानो ।
हर युग में पुरूशार्थ  ही  श्रेष्ठ रहा है  ।
कदर करो बात की, भ्रम है यह मानो  ।
चिद  का आभास करो ,चिदानंद तुम हो ।
भाव का रूप रंग इसको ही मानो ।
आनंद , सुख पाओगे कर्म रत रहो सदा ।
कर्मो की बेल को समझो 'औ' जानो।
-उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

Friday, August 26, 2016

गीत गाओ सजन , गुनगुनाओ सजन ,

गीत गाओ सजन , गुनगुनाओ सजन।
पास बैठो जरा मुस्कुराओ सजन ।


प्रेम ही प्यार से हम सफ़र पर चलें
हिम शिखर देख कर थोड़ा हम हैं गले।
आस में प्यास की रश्मियां घुल रहीं।
मन तरंगित हुआ पास  हम हो गए।
             देख कर चकित हो गए नजारा सजन।
 

लोग कहते यहाँ शिव का यह धाम है।
धुन रमा कर जो बैठे ही रहते सदा।
पास सती का है कुछ मोहक सामीप्य।
बस उमंगों में धीरज  बंधाओ  सजन।
             गीत गाओ सजन , गुनगुनाओ सजन।


शाक्ति से शिवम् को मिल रही ऊष्मा।
हैं वह बैठे भभूति लगाए हुए।
इस जगत का वही करते कल्याण हैं।
उनका मोहक स्वरुप दिखाओ सजन।
          गीत गाओ सजन , गुनगुनाओ सजन। 

Thursday, August 25, 2016

श्याम तेरी मुरली

 श्याम तेरी मुरली की तान बड़ी मोहक । 
तन मन में प्रेम का रस भर जाता ।
सुध -बुध सब खो जाती, तान बड़ी सोहक । 
             श्याम तेरी मुरली की तान बड़ी मोहक । 
आँखों का अंजन  अधरों पे चला जाता । 
अधरों की लाली आँखों में समां जाती । 
ऊपर का नीचे सब वस्त्र हो जाता । 
कैसे है जादू ओ श्याम तेरी मुरली में । 
पूरा का पूरा वंशी बट खो जाता । 
             श्याम तेरी मुरली की तान बड़ी मोहक । 
नखसिख सब प्रेममयी ,सब ही हो जाता। 
बच्चा भी अठखेली भूल सा है जाता । 
पशु-पक्षी सन्न हो , सुनते है तान को । 
मुरली के रस में सब मगन मगन हो के । 
नाच उठते मृग,मयूर ,कोयल भी मौन है । 
क्या रस तुम दे देते , श्याम अपनी तन में । 
झूम झूम गगन,मही ,सूरज खो जाता । 
             श्याम तेरी मुरली की तान बड़ी मोहक ।  
-उमेश वहन्द्र श्रीवास्तव 

Wednesday, August 24, 2016

वंदे भारत वाशिंदे

वंदे भारत वाशिंदे, वंदे भारतवासी।
अतुलित वीर पुरोधा, अद्युतीय साहस, ज्ञानी।
मानस मे अनुगूंज प्रेम की, अविरल बहती धारा।
डंका बजता हरदम तेरा, प्राण निछावर ओ बलिदानी।
रहते अविरल प्रतिपल, प्रतिछण सजग बने प्रहरी।
वसुधा खातिर रोम-रोम मे, रक्त सदा गरमाता।
धरती के तुम अमर सूत हो, अमर है तेरी कहानी।
बाजू मे पल-पल फड़कन है देश बड़े नित आगे। 
तुम तो वरद सरस्वती पूजक, भारत के गुण खानी।
जय हो भारत, जय हो भारत, वर अमर सेनानी।
                                                                       उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

Tuesday, August 23, 2016

गीत गाते चलो ,

गीत गाते  चलो ,
मुस्कुराते चलो ।
जिंदगी गीत है ,
उसको गाते चलो ।
यह सफर जिंदगी का ,
सुहाना बहुत ,
इसमें सपने बहुत ,
है हकीकत तो कम ,
दम हो-तो,
सपनो को तुम हकीकत करो ,
 जिंदगी में तो आएंगी ,
अड़चन बहुत ,
 अड़चनों को ख़ुशी से
हटाते  चलो ।
एक ही सत्य है ,
एक ही है पिता ,
उसको श्रद्धा से बस ,
नमन करते चलो ।
वो परम सत्य है,
उसकी सत्ता बड़ी ,
इस हकीकत को तुम ,
स्वीकार करते चलो ।
           गीत गाते  चलो ,
           मुस्कुराते चलो ।
                                          उमेश  चंद्र श्रीवास्तव 

Monday, August 22, 2016

गीत

(गतांक से आगे )
                             


जन मन  भारत वासी,
महिमा तेरी है अविनाशी। 
मनु-श्रद्धा की अमर कहानी ,
हम सब उनके वंशज ,
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाई ,
सब हैं प्रेम से रहते ,
अमर प्रेम ही धरोहर है ,
हम सब भारत वासी ,
          जन मन  भारत वासी,
          महिमा तेरी है अविनाशी। 
सदियों से पावन भूमि का ,
ब्रह्माण्ड में नाम रहा है ,
तिरंगे की शान निराली  ,
तिरंगा है प्यारा ,
लहराए-यह जन-मन भीतर ,
महिमा अविरल धारा ,
यह बसता-सब रोम-रोम में ,
मन मस्तिष्क की धारा ,
प्यारा-प्यारा अपना तिरंगा ,
जन-मन का उजियारा ,
इसके बूते भारत बढ़ता,
धरती का यह प्यारा,
न्यारा-न्यारा अपना तिरंगा ,
लहराए-लहराए ,
हम सब भारत वासी इसके ,
यह सब का है दुलारा ,
          जन मन  भारत वासी,
          महिमा तेरी है अविनाशी। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-

Sunday, August 21, 2016

गीत

(गतांक से आगे )
                             


जन मन  भारत वासी,
महिमा तेरी है अविनाशी। 
गांधी बाबा नेहरू चाचा
वीर सुबाश यहाँ के ,
परचम लहरा अमर हो गए ,
देश को मुक्त कराया ,
उनकी अनुपम गाथाओं से ,
अभिसिंचित सब वासी  । 
                           जन मन भारत वासी,
                           महिमा तेरी है अविनाशी। 

गीता की अमर वाणी गूँजे ,
राम रमे हैं – रग-रग,
कृष्ण की बलिहारी अदभुत  ,
सती सावित्री ,आपला का ,
तप अक्षुण्य सुखरासी । 
                           जन मन भारत वासी,
                           महिमा तेरी है अविनाशी। 
 वेद उपनिषद ,
आख्यान यहाँ पर ,
पूरानो की चर्चा ,
सुर , कबीर,’औ  तुलसी की ,
बहती पवन धारा ,
जन –जन का सब कारा हरती
समरसता है देती ,
भारत जग मे सबसे ऊंचा ,
सुसंस्कृत हैं वासी। 
                           जन मन भारत वासी,
                      महिमा तेरी है अविनाशी। ...
(शेष कल )

                                        -उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

Friday, August 19, 2016

गीत

जन मन भारत वासी,
महिमा तेरी है अविनशी।
मध्य ह्रदय में मध्य प्रदेश है,    
बिहार की क्या है बातें।
दक्षिण में भक्ति की धरा,
पश्चिम की अतुल कहानी।
पंजाब, सिंधु वीरों की भूमि,
मराठा की अतुल्य निशानी।
राणा की रणभूमि यहाँ पर,
अशोक चक्र की महिमा।
झांसी की रानी का-
तो, था कोई नही निशानी।
उज्वल भूमि बुंदेलों की,
बसतें सक्षम वासी।
                   जन मन भारत वासी,
                  महिमा तेरी है अविनशी। ... (शेष कल)
                                   -उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

Thursday, August 18, 2016

गीत

जन-मन भारतवासी ,
महिमा तेरी है अविनाशी ।
उत्तर में हिमगिरी  शिखर है ,
गंगा-यमुना बहती ,
माँ सरस्वती का पावन जल ,
हृदयों में मुक्त रहता ,
ब्रह्मपुत्र की निर्मल धरा ,
उदधि जल लहराता ,
पुलकित जन-मन ,
हर्षित होकर ,
गाते  गौरव गाथा ।
           जन-मन भारतवासी ,
           महिमा तेरी है अविनाशी।                                          (शेष कल )

                                                                                       -उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

Monday, August 15, 2016

गीत

आजादी के परवानों  की बात बताएं क्या ?
किस्से-कहानी नहीं हकीकत राज बताएं क्या ?
वह तो सरहद पर नित जीते भारत के सम्मान में ।
वक्त पड़े तो मर मिट जाते देश के गौरव गान में ।
सुख वैभव को त्याग डटे  हैं सुबह, दुपहरी रात पहर।
घर में भाई बहना पत्नी सब के  मोह को त्याग कर ।
 मात-पिता के अमर पुत्र हैं वह धरती के लाल हैं ।
 रक्त लाल उनका भी रहता ,इच्छाएं प्रेरित करती।
पर वह देश हितार्थ डटे  हैं इच्छाओं को मार कर।
देश सपूतों तेरी पूजा अर्चन क्या जग कर पायेगा ?
वीरसपूतों तेरी कहानी देश सदा ही गायेगा ।

                                                                                                             -उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

Sunday, August 14, 2016

गीत

भाई से भाई कभी न लाडे ,भाईचारा को बढ़ाते चलो,। 
भाई से भाई को मिलते चलो , भाई चारा बढ़ाते बढ़ो ।
द्वेष का भाव जो मन में भरे , उसको जहाँ से हटाते चलो । 
प्रेम तत्व जो अविरल है ,उसको ह्रदय से लगते चलो । 
स्वार्थ मई जो दृष्टि लगे उसको नज़र से उतारते  चलो । 
देखो मिलेगा अनुपम आनंद , यही भाव को जागते चलो ।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव  -

Saturday, August 13, 2016


गीत 



विचारों के अनुपम ही  सागर मे डूबा,
उधर जा रहा था, इधर आ गया मैं |
नहीं चाहिए कोई अधरों का पानी ,
नहीं है मसलना अब कोई जावनी ,
फकत वह नशा था ,वह दूषित था पनी|


                      विचारों के अनुपम ही  सागर मे डूबा, 
                          उधर जा रहा था, इधर आ गया मैं|


वह नाजुक काली थी, उसे अब सँवारो ,
वह फूली फली थी , उसे अब बढ़ाओ ,
रगों मे भी उसके भरो वह कहानी ,
वह मोहताज न हो , स्वयं आत्मनिर्भर ,
उसे बस बताओ प्रबलता की बानी |


                          विचारों के अनुपम ही  सागर मे डूबा, 
                          उधर जा रहा था, इधर आ गया मैं|

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, August 12, 2016

गीत

उसकी काली आँखों में  मधुमास बहुत है ,
उसके अधरों पर मद का अहसास बहुत है ।
रोज वह आती छत  पर चुपके-चुपके देखो ,
उसके पायल में रुनझुन झंकार बहुत है ।
आकर छत  पर टहल रही है मुक्त भाव से ,
क्या पड़ता है फर्क उसे अन्य किसी चाव से ?
वह तो बस मस्ती में देखे  गगन , मही  को,
उसका ही बस नाम समझ लो देवी दुर्गा ।
आकर्षण चेहरे पर, उसके बहुत सी  रौनक ,
ढंग  हो जाते , सब ही उसको देखें टक-टक ।
वह तो कोमल, कमलदल है उसको मनो ,
इस धरती की रक्षक तुम उसको ही जानो ।
भव सागर की नैय्या अगर डूबे उतराए ,
हाथ पकड़ लो उसका , पर सहज ही होगे  । 

                                   

उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 

Tuesday, August 9, 2016

ब्रम्ह

शब्द ब्रम्ह है,
ब्रम्ह शब्द है। 
बोलो फिर है-
ब्रम्ह कहा-कहा?
शब्दो के अर्थों को समझो,
ब्रम्ह स्वयं मिल जयेगा। 
दुनिया की बातों में भ्रम कर,
नही मिलेगा कुछ भी तो। 
जैसे कुंडल नाभि  में बस्ती,
मृग ढूंढें है यहाँ वहा।  
वैसे ही हम भटक रहे है,
ब्रम्ह वहां है, वहा-वहा!

Friday, August 5, 2016

कल्पना जीवन की सौगात ,

कल्पना जीवन की सौगात ,
बिना कल्पना के नहीं आता ,
जीवन मे मधुमास |
रंग-बिरंगे फूल घनेरे ,
पेड़-पौध गंग की लहरें ,
सब मे है उल्लास |
            कल्पना जीवन की सौगात ,
सुधी , सुधा रस पाने आतुर ,
साधू भस्म रमाने आतुर ,
सब की अपनी-अपनी बात |
            कल्पना जीवन की सौगात ,
प्रिया,बिरहनी प्रेम मे तड़पे ,
बच्चा माँ का अंचल पाये ,
सुध-बुध खो कर जग मे रहना ,
नहीं है अच्छी बात |
            कल्पना जीवन की सौगात ,
बिना कल्पना जीव अधूरा ,
उसका सपना होगा पूरा ,
यही तो है विश्वास |
            कल्पना जीवन की सौगात ,
विश्वासों की बेल अमर है ,
इसके बल जीते हैं सब ही ,
नहीं है चलता बिन इसके ,
जीवन का यह श्वास |
            कल्पना जीवन की सौगात ,

                        -उमेश श्रीवास्तव 

Thursday, August 4, 2016

सखे, मत मिथ्या वाणी बोल।

सखे, मत मिथ्या वाणी बोल। 
घर-दुआर सब, महल अटारी, 
क्या है इसका मोल?
                 सखे, मत मिथ्या वाणी बोल।
रंगमहल, यह तन कुम्भ है,
लुढक गया तो तूटेगा,
क्यों इतराता, मांझी बनकर,
क्या इसका है मोल? 
                   सखे, मत मिथ्या वाणी बोल।
रूप रंग, माया की बातें,
व्यर्थ रमा है इसमें प्राणी,
व्यथित-थकित होकर के तू भी,
क्यों भागता है गोल?
                     सखे, मत मिथ्या वाणी बोल।  
राम रमे  हैं, कृष्णा रमें हैं, 
सारे संघ-संघाती तेरे,
क्या रह पाए, तू ही बोल?
                      सखे, मत मिथ्या वाणी बोल।
सुध-बुध खो कर,
लंपट, कामी, लोभ मोह वश,
भटक रहा तू,
क्या है इसका तौल?
                    सखे, मत मिथ्या वाणी बोल।
                                                
                                 -उमेश श्रीवास्तव 

Wednesday, August 3, 2016

मैथिली शरण गुप्त की जयंती पर गुप्त जी को कोटी कोटी नमन –


                                                      (रचना समय – 3/08/16,3:30 )

गुप्त तुम्हारा काव्य अमर है ,
राम उपासक तुम्हें प्रणाम |
भारत-भारती के रचनाधर्मी,
मर्यादा तुममें अविराम |
काव्य रस के सफल उपासक ,
कविता तेरी मानुजा धार |
भक्ति भावना मर्यादा है ,
कविता तेरी ओ घनश्याम |
जन्म अर्थ का मर्म बताया ,
इतिहास बिन्दु को खूब खंगाला |
उसमे से मोती चुन –चुन कर ,
लिख गए अमर किर्ति का ज्ञान |
कविता तेरी सहज सुलभ है ,
तुम तो  कवि के हो निज धाम|
हे भारत के अमर पुत्र तुम ,
तुमको करता उमेश प्रणाम |

                              -उमेश श्रीवास्तव 

Tuesday, August 2, 2016

गीत

फूल ने फूल से मुस्कुरा कर कहा,
तुम तो सुन्दर, तुम्हारी छटा है अलग। 
तुमको देखा भी जिसने वो मोहित हुआ,
तुमको देखा करे, वह खड़ा ही खड़ा। 
तुम तो प्यारो के प्यार का इज़हार हो,
तुम तो पलना 'औ' ललना का श्रृंगार हो। 
तुम हो लोगो की चाहत, तुम्हे ढूंढ़ते,
प्रेम हो, या ख़ुशी, मौको पर पूछते। 
तुम छबीली के गेसू का श्रृंगार हो,
तुम सभी नर 'औ' नारी का गलहार हो। 
तुमसे स्वागत करे, सभी निज अतिथि का,
तुमको अर्पण करे माँ के चरण कमल में। 
तुम सुहावन, मनावन की वह तार हो,
तुम सुहागन की सेजो का श्रृंगार हो। 
तुम तो महफ़िल, कथा, व्रत की वह शान हो,
बिन तुम्हारे अधूरा है जीवन हवन। 
मोतियों में गुथी, बाजूबंद तुम बनी,
कभी नारी ललाट का श्रृंगार तुम। 
तुमसे आती है जीवन में खुद रागिनी,
तुम तो प्यारे सजन की, हो सजनी भली। 
तुमपे वार, निवारा जगत झूमता,
तुम हो फूलों की रानी, महक की कली। 
फूल विहंसे तो मानों जगत खुश हुआ,
तेरे चाहत की लोगों में सुंदर कला। 
                                                 ( रचना समय - 02 /08/2016, 6:30 pm )
                                                   -उमेश  श्रीवास्तव 

Monday, August 1, 2016

कविता का उद्देश्य

छंद ,अलंकृत सृष्टि ,काव्य हो ,
यह उतना आसान नहीं ,
भाषा सुदृण ,भाव सुंदर हो ,
काव्योचित यह मर्म सही |
रोज भाव का आना-जाना ,
अंतर मे स्वाभाविक है |
उसे तूलिकामय करना ही,
कवि धर्म का कारक है |
यद्यपि काव्य शास्त्रियों ने –
कविताहित  विधान गढ़ा ,
पर विधान सापेक्ष लिखना ,
है उतना आसान नहीं
|
छोड़ो प्रतिमानों की बातें ,
कवि को मानव मूल्य –
विहित भावों को ,
भव मंगल हित गढ़ने दो| 


                  (रचना आज सुबह आठ बजे लिखी गयी )
                    -उमेश  श्रीवास्तव 

भय का वातावरण दिखाया

Poem of Umesh chandra srivastava  भय का वातावरण दिखाया, भयाक्रांत सब लोग यहां।  बैठक ,भोजन पर आमंत्रण , चर्चा है अब लोक , जहाँ...