month vise

Saturday, December 31, 2016

बीत गया है वर्ष पुराना ,नव नूतन अब आएगा

बीत गया है वर्ष पुराना ,नव नूतन अब आएगा।
यहाँ-वहां सब फूल बाग़ भी ,खिल-खिल कर मुस्काएगा।
अंशुमाली प्राची से भी ,वसुधा को दमकायेंगे।
इधर जनों में प्रेम भाव का ,अंकुर विस्तारित पाए।
राजनीति की अटखेली भी ,समतल भूमि पर झूमे।
उलट-बासी 'औ' तिकड़मबाजी , फुर-फुर से उड़ जाये यहाँ।
मौसम ने करवट तो ली है ,जन भी माधु मुस्काएगा।
उधर विरहणी न अब तड़पे ,विरह अग्नि की ज्वाला में।
सुन्दर उज्वल चेहरा वाला ,बच्चा भी हरषायेगा।
मधु रागों की राग रागिनी ,मधुवन जैसे फैले यहाँ।
आशुतोष की व्यापकता में ,पूरा जग भी झूम उठे।
मिथ्यवादिता जड़ से जाये ,सत्य आवरण खोल, बढ़े।
सद्बुद्धि से नेता पनपे ,यभी जगत बन पायेगा।
आओ मिलकर गीत यहाँ पर,खुशियों के हम सब गायें।
झूमे ,नाचें मस्ती में सब ,'औ' सबको भी मस्त करें।
नारी का सम्मान बढे ,'औ' नारी मुदित रहे यहाँ।
लोग-बाग़ की जननी वह तो ,बहन ,दुहिता मान बढ़े।
अपना प्यारा ध्वजा तिरंगा ,विश्व पटल पर लहराये।
वीर सपूत भी रणभूमी में ,अपना डंका बजवायें।
आकुल-व्याकुल रहें यहां न , सबमें पुलक विचार बने।
जड़ से दूषण मिटे यहाँ पर ,स्वास सरस सब हो जाये।
चोरी-ओरी की जड़ता भी ,समूल नष्ट हो जाये यहाँ।
हमको भारत देश है प्यारा ,भारत विश्व में है न्यारा।
प्यारे भारतवासी सुन लो ,भारत है सर्वोच्च यहाँ।
विश्व विदित है भारत गरिमा ,आगे बढे ,सम्मान मिले।
लोक हितों की बात सोचकर , जन-मन भी सब काम करें।
स्वार्थ-वार्थ को जड़ से फेको ,अपने में स्वाभिमान भरो।
यही बात व्यवहार ही पनपे ,नाव नूतन मय वर्ष रहे।







उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, December 30, 2016

प्रेम दिल का मिलन केवल ,देहं तो आनंद है

प्रेम दिल का मिलन केवल ,देहं तो आनंद है। 
मन उमंगों का आवेशित ,देहं तो बस छंद है। 
रूप गागर -सागरों में ,रसासिक्त करता हुआ। 
देहं का भोला समर्पण पा हुआ मदमस्त है। 
प्रेम तो भक्ति है शक्ति ,मानवीय संवेदना। 
देहं तो पशुवत बनाती ,प्रेम देता दृष्टि है। 
प्रेम में जो पक गया सो ,बन गया अनमोल प्राणी। 
देहं में लिप्तीकरण तो ,भोग का आध्यात्म है। 
प्रेम का स्वर तो मधुर है, प्रेम तो बस त्याग है। 
देहं का मिलना बिछड़ना ,वासना का राग है। 
प्रेम तो अद्भुत क्षुधा है ,भर नहीं पाता कभी। 
देहं की सीमा निहित है ,बल गया वह राग भी। 
पर बताओ प्रेम में तो ,साँस तक अनुराग है। 
प्रेम है ईश्वर की वाणी ,प्रेम सब कुछ आज है। 
जो बना इस पथ का प्राणी ,उसका जीवन सार्थक। 
देहं के चक्कर जो भरमा ,वह गया इस लोक से। 
जहाँ जीवन की दशाएं ,दुर्दशाएँ बन गयी। 
इसी से मैं कह रहा हूं ,प्रेम तो बस प्रेम है। 
इसी पथ का बन के राही ,प्रेम से बस जी रहो। 
    






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Thursday, December 29, 2016

अधिकारों की जंग शुरू है

अधिकारों की जंग शुरू है ,
सत्ता के गलियारों में।
कोई मांगता हक़ -हकुक़ तो ,
कोई को रुतबा प्यारा है।
सरफ़रोशी की अब बातें ,
पढो किताबों में भाई।
सत्ता धरी चढ़ा-चढ़ा कर ,
बस क़ुर्बानी मांगे हैं।
अपना कुनबा सुखी रहे सब,
जनता मरे-खपे जी भर।
उसको मुआवजा दे-देकर के ,
अपना पीठ बजाते हैं।
ऐसा भी योद्धा क्या तुमने ?
रणभूमि में देखा है।
दूजे को ललकार कहे वह ,
अपना सुविधा से पोषित।
अपने लिए है नीति दूसरी ,
जनता को भरमाना बस।
मानों,प्यारे अब भी मानों,
सुधरो कुछ व्यवहारों में।
जो भी करो ,वही तुम बोलो ,
तभी काम चल पायेगा।
वरना आए वीर धुरंधर ,
कितने ही इस जगती पर।
ठहरा वही यहाँ पर ,वह ही ,
जिसने संयत बात कही।
मेरा तुमको भी सुझाव है ,
कहो वही ,जो खुद भी करो।
वरना नाहक मत भरमाओ ,
भागो ,चलो यहाँ से तुम।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव-

Wednesday, December 28, 2016

क्योंकि मैने उसको देखा

क्योंकि मैने उसको देखा ,
उसने भी मुझको है देखा। 
देख-दिखने में ही सारी ,
बात बनी, बिगड़ी जाती। 
सपन सजोये जो मन भीतर ,
बिखर-बिखर के खो जाते हैं। 
उसका मुखड़ा सुन्दर सा कुछ ,
अब सुंदरता ,लगी नहीं। 
शायद भाव हमारे भीतर ,
उसके प्रति कुछ खिसक गयी। 
उसके मन में-मेरा मुखड़ा ,
अच्छा है अब भी -क्या जाने ?
 मैंने अपनी बात बता दी ,
उसने तो कुछ कहा नहीं। 
न जाने अब कब सुधरेंगे-रिश्ते ,
जो अटपटे हुए । 
पता नहीं वह मौसम कैसे ,
देख-दिखाने में फिसला। 
अब तो उसका सुन्दर मुखड़ा ,
है अतीत की बात हुई। 
न जाने कब वर्तमान में ,
उसका मुख सुन्दर होगा। 
मन के भाव-विसरते,आते ,
न जाने क्या बात हुई ? 
जब वह फिर से सुन्दर दीखे ,
'औ ' मन के सब भाव जगे। 
तब वह रूप सलोनी कैसे ,
मुझे निहारेगी ,देखेंगे। 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Tuesday, December 27, 2016

आंसू छलका, बीत राग की - 3

आंसू छलका, बीत राग की ,
याद पुरानी आयी है।

कहाँ मिलेगी अब जीवन में ,
उसकी वह मंजुल रातें।
रातों का था सफर सुहाना ,
जीवन की जो थाती है।
वाह रे!प्रकृती तेरी महिमा !!
रूप रंग के सागर तुम।
कब जीवन में आनंदित स्वर ,
कब रंगों का बदरंग रंग।
तेरी बातें-तू ही जाने ,
मुझको बस यह पता हुआ।
ऐसे जीवन ही चलता है ,
कोई आया यहाँ नया।
पतझड़ जैसे मौसम का भी ,
मूल्य रहा जीवन भर में।
वह रे! प्रकृती !!
तेरा रूप सलोना है।
मनभावन सा दर्शन तेरा ,
कभी धूप है, कभी है छाया।
कभी रात की अंधियारी है ,
जीवन भी चलता ऐसे।
कभी रूप की फुलवारी है ,
कभी विहंसते लोग यहाँ।
जीवन की इस चक्र धुरी पर ,
जन -मन आते-जाते हैं।
तेरा भी तो आना जाना ,
सबको यहाँ सुहाता है।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Monday, December 26, 2016

आंसू छलका, बीत राग की-2

आंसू छलका, बीत राग की ,
याद पुरानी आयी है। 

याद मुझे है उसका रुनझुन ,
मन को विभोरित कर जाता। 
मन के सरे तार-वार को ,
उसका मिलना ही भाता। 
एक बार की बात बताऊँ ,
हम दोनों गए संगम तट। 
वहां मिला था साधु-एक जो ,
आगत बात बताता था। 
उसने पुछा -साधु भईया ,
हम सब का है सफर कहाँ ?
झट वह बोला -
तुम छोड़ोगी पहले साथ। 
बाकी सुखमय जीवन है। 
दिवस सलोनी - मनुहारों में ,
कैसे समय गया-मेरा। 
आज आहुति देकर आया ,
उसको पच तत्व अर्पित। 
मन भी थोड़ा व्यथित हुआ था ,
उसे समर्पण कर आया। 
जहाँ से-रूप सलोनी आयी ,
वहां विदा मैं कर आया। 
अब तो सुधियों की झुरमुट में ,
उसकी सुध ,उसकी बातें। 
:
:
:
:
:
:
:
:................................ शेष कल 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Sunday, December 25, 2016

आंसू छलका ,बीत राग की-1

आंसू छलका ,बीत राग की ,
याद पुरानी आयी है। 
सुधियों का वो मंजर-आलम ,
बरबस कौंध गया मन में। 
तन भी शिथिल हुआ अब कुछ तो ,
पर मन में बिहसन वह है। 
रूप दुलारी जब आयी थी ,
मेरे घर 'औ' आंगन में। 
भावों के सब पंख उगे थे ,
पछुआ मन बौराया था। 
सुबह-दुपहरी, शाम-भोर की ,
क्या सुध थी ,हम दो जाने ?
हरदम मन परसन को आतुर ,
लोक -लाज का भय भी था। 
पर वह रूप सलोनी चातुर ,
इधर-उधर मौका ताड़े -
आ जाती पहलु मेरे। 
:
:
:
.......शेष कल 




उमेश चंद्र श्रीवास्ताव- 

Saturday, December 24, 2016

सर्द हवाएं ,बौराये मन ,गलन बढ़ी है - 3

सर्द हवाएं ,बौराये मन ,गलन बढ़ी है।
सर्द निशा में शाल ,दुपट्टा ओढ़ खड़ी है।

पिता समझते थे बेटी अब तो हुई सायानी।
पर यह बोझिल पत्नी-कर रही नादानी।
दुहिता ने आवाज पकड़ ली -माँ से बोली -
मम्मी तुम पापा को कमरे में ले जाओ।
वहीँ तुम्हारा -तुम दोनों का खाना हूँ लाती।
बेटी कह कर चली गयी-दूजे कमरे में ,
माँ झट दौड़ पड़ी -लिपटी अपने प्रियवर से।
उधर प्रिया का भाव समझकर-प्रियवर बोले ,
धीरज धरो -समय होगा अनुपम हितकारी।
क्यों उतावली बनी -जरा कुछ पल तो ठहरो।
नहीं चलेगी तुरन्त-फुरंत यह मेहरबानी।
फिर क्या था ?
सब वही हुआ जो प्रिय को प्रिय था।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, December 23, 2016

सर्द हवाएं ,बौराये मन ,गलन बढ़ी है-2

सर्द हवाएं ,बौराये मन ,गलन बढ़ी है।
सर्द निशा में शाल ,दुपट्टा ओढ़ खड़ी है। 

सहसा झोंका तेज हुआ ,बयार बौराई ,
इधर तनों में गर्म-मर्म की ऋतु गरमाई। 
सर्द हवाएं ,मन बौराये ,कैसे सुलझे ,
खड़ी सर्द मौसम में -बाहर बरामदे में ,
प्रिय पाहुन ,प्रियतम उसके -कब आएंगे। 
कब उसके तन-मन की उठती प्यास बुझेगी। 
सर्द हवाएं क्या लेंगी ,मौसम है ऐसा ?
मिलन-मिलन का भाव सर्द में बढ़ता जाता। 
क्या कर जाये प्रीत की रीति सुलगती ,बिहवल ,
और देखती चन्दा को-चकोर बनी वह। 
उसके चन्दा कब आएंगे-भान नही है ,
अब तो लगता उसको-मर्यादा का ध्यान नहीं है। 
तभी तुनुक कर वह बोली -दुहिता तुम जाओ। 
रात बहुत हो गयी -जाके अब तुम सो जाओ। 
वह क्या जाने -उसकी दुहिता अट्ठारह आने ?
समझ रही थी माँ के भाव -मगर क्या बोले ?
है मर्यादा तोड़ नहीं सकती वह परतें !
और उधर माँ -बिरह अग्नि को धीरे-धीरे ,
शांत करे -कैसे वह, कुछ समझ न पायी। 
तभी दूर-बाहर से कुछ आवाज है आयी ,
तपक दौड़ -वह भागी बहार जाकर देखा। 
प्रिय प्रियतम का मुखड़ा, सजा-सजा सा दिखता। 
बोली गलन बहुत है -जल्दी अंदर आओ ,
फिर वह बोली-बेटी से तुम जा सो जाओ। 
                                                         . 
                                                         . 
                                                         . 
                                                         . 
                                                          शेष कल......... 

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Thursday, December 22, 2016

सर्द हवाएं , बौराये मन , गलन बढ़ी है

सर्द हवाएं , बौराये मन , गलन बढ़ी है।
सर्द निशा में शाल ,दुपट्टा ओढ़ खड़ी है।
चेहरे पर कुछ सुर्ख ,मगर लालीपन भी है।
अधरों पर मुस्कान ,खिली थी दोनों ऑंखें।
गालों पर भी चमक ,तनों में दमकम भी था।
और इधर से खड़ा देखता -मैं टुक-टुक था।
सर्द हवाओं से शालों का मंथर उड़ना ,
और उठा कर बाहों से -उसे फिर लपेटना।
क्रिया इसी में व्यस्त मगर कुछ अकुलाई थी।
अंदर की चाहत सिमट बहार आयी थी।
उसके दोनों कर -किसी का आहट पाकर।
करने को बेचैन ,उसे आलंगित करने।
उधर गगन में दूर चाँद की आंख-मिचौली।
इधर सघन था मन भीतर प्रेमांकुर का पुट।
बहुत सहेजा मगर गलन से तन-मन कँपा।
बहार से थी ठण्ड ,अगन मन भीतर अग्नि।
कैसे उसे बुझाये -इसी धुन में थी पगली।




(शेष कल........)
उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, December 21, 2016

तुम सहारा बनो , मैं सहारा बनूँ

तुम सहारा बनो,मैं सहारा बनूँ ,
ज़िन्दगी के डगर साथ चलते रहें। 
तुम न अपना कहो ,हम न अपना कहें ,
ज़िन्दगी के सफर साथ चलते रहे। 
तुम पे बीती जो बीती ,वो तुम जानती ,
मैं न पूछूँगा ,न तुम बताना मुझे। 
पूछने-पाछने में बिगड़ते हैं दिन ,
सच डगर है ,इसी में हम ढलते रहें। 
कोई बातें अगर दिल में हो जो सनम ,
जिससे आगत सुनहरा बने तुम कहो। 
हम भी वो भी कहेंगे ,और तुम भी कहो ,
ज़िन्दगी का सफर कुछ सुहाना बने। 
तुम सहारा बनो,मैं सहारा बनूँ ,
ज़िन्दगी के डगर साथ चलते रहें। 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Tuesday, December 20, 2016

जब-जब याद तुम्हारी आती-2

जब-जब याद तुम्हारी आती ,
तब-तब कविता लिखता हूँ।  

वर्णन करना बहुत-बहुत है ,
पर जो यादें आती हैं। 
उन्हीं बात को बिम्ब बना कर ,
हँसता 'औ' मुस्काता हूँ। 

कविता तो बोझिलता हरती ,
मन को तरंगित कर जाती। 
तन के सारे पोर-पोर में ,
रस सुखद ही भर जाती। 

थका-थका तन-मन जब रहता ,
तब तुम थोड़ा मुस्काती। 
आती हो यादों की बेल बन ,
मन को हर्षित कर जाती। 

वही तुम्हारा रूप याद है ,
वही तुम्हारी बातें भी। 
वही तुम्हारी साँस याद है ,
वहीं तुम्हरी रातें भी। 

याद ,सभी कुछ याद-वाद है ,
पर तुमसे न कोई विवाद ?
करके भी कर लूँगा क्या मैं ?
बस केवल तनहा संवाद। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Monday, December 19, 2016

जब-जब याद तुम्हारी आती -1

जब-जब याद तुम्हारी आती ,
तब-तब कविता लिखता हूँ। 
साँझ , सवेरे , रात , दुपहरी ,
तुमको याद मैं करता हूँ। 

आसमान में जब-जब बादल ,
उमड़-घुमड़ के छाते हैं। 
यादों का मंडल बन जाता ,
यादों में खो जाता हूँ। 

तनहा-तनहा विरला सा मैं ,
जीवन का सुख दुःख सहता। 
साथ अगर तुम जो होती तो , 
बात और कुछ हो जाती। 

पर हूँ विवश ,लाचार प्रकृति से ,
कुछ भी नहीं कह सकता हूँ। 
प्रकृति हमारी मनभावन है,
प्रकृतिमयी मैं रहता हूँ। 

सांसों में बसती बस तुम हो ,
और अचेतन मन में भी। 
चेतनता में रमी हुई हो ,
अंग-अंग 'औ' जीवन में। 




(शेष कल...)
उमेश चंद्र श्रीवास्तव -






Sunday, December 18, 2016

पूरा जीवन है मधुशाला-2

पूरा जीवन है मधुशाला।
पी लो तुम प्यालों पर प्याला।

ऊपर गगन मही है नीचे ,
इसका कोई भान नहीं है।
केवल धुन में झूम रहे हैं ,
पीने वाले ,पीने वाला।

राग द्वेष से मुक्त रहे हैं ,
नहीं बैर से कोई नाता।
सबको बुला-बुला कर देते,
आओ पी लो ,छक मतवाला।

पंथ एक के पथिक बने सब ,
झूम रहे ,पग-पग वो धरते।
घुमा फिरा कर बात न करते ,
कहते चलो-चलो मधुशाला।

राजा-रंक का भेद नहीं है ,
यहां सभी मधुप्रेमी धुन में।
कहते आओ पैग लगा लो ,
जीवन तो मधु है ,मधुशाला।

                                                 पूरा जीवन है मधुशाला।
                                                 पी लो तुम प्यालों पर प्याला।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -


Saturday, December 17, 2016

पूरा जीवन है मधुशाला-1

पूरा जीवन है मधुशाला।
पी लो तुम प्यालों पर प्याला।
मंदिर-मस्जिद बैर नहीं है,
ना ही यहाँ पर कोई बवाला।

दुःख का कोई भान नहीं है ,
सुख में झूमे सब मतवाला।

रूप सुंदरी की आशक्ती  ,
नहीं यहाँ है ,केवल प्याला।
हाला जीवन ,प्याला जीवन ,
झूम रहा हर पीने वाला।
                                          पूरा जीवन है मधुशाला।

भाई-बहन पत्नी है घर में ,
नन्हा-मुन्ना भटके डग में।
'पापा को क्या पड़ी हुई है?'
रोज बने लगते मतवाला।
                                       पूरा जीवन है मधुशाला।...........




(शेष कल )

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, December 16, 2016

जीवन के सागर में, गागर है प्रेम का।

जीवन के सागर में, गागर है प्रेम का।
बून्द-बून्द साँसों से, जीवन तो चल रहा।
जीवन है रागिनी, मीतों के प्रेम का।
छलका तो जानलो, प्रेम की उमंग है।
जीवन तरंग है, आंसू है, खुशियाँ है।
जीवन की धारा  में, संग, साथी बनतें है।
जीवन पतवार का, प्यार-वार जीवन में।
होता संजोग से, जीवन की बात भी।
बनता है योग से, जीवन की रसना है।
रस ही आनंद है, इसमें जो डूब गया।
वही बना छंद है, छन्दों की गूँज में।
रास, बिंब, अलंकार, यहाँ पूजे जाते है।
ऐसा ही जीवन है, चलता है, चलेगा।
साथी संघाती का, जाना भी खलेगा।
खलना "औ" छलना, तो जीवन की रश्म है।
कसमे व वादे भी, जीवन की भस्म है।
इसको मल-मल के, तन मन में डाल लो।
खाल-वाल छोड़ छाड़, सत्य को बाँध लो।
वही सुख पायेगा, जीवन के जोग का।
पाँव-पाँव धरती पे, रखता चला जाएगा।
                                                          - उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

Thursday, December 15, 2016

मंथन

मंथन करके अमृत धारा,
निकल रहा अंतर से। 
उसे बढाओ पालो ,पोसो ,
उससे है सब विकसित। 

बीज पड़ा तब अंकुर फूटा ,
गरल-तरल से ऊपर। 
बूँद-बूँद से रूप बना तब ,
एक पदार्थ सा अविरल। 

तरल-गरल जो भी तुम मानो ,
तत्व एक ही होता। 
स्रोता बहता हुआ दीखता ,
जड़ पदार्थ सा जैसा। 

पर जड़ में जो बुद-बुद होता,
वही अंश जीवन का। 
पक-पक करके भीतर-भीतर ,
पुलक शरीर सा बनता। 

प्राण तत्व कुल भूषण सा ,
तन ढांचा वह संवरता। 
लुढ़क-पुढ़क कर तब ,
जीवन सा अंकुर बेल निकलता। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, December 14, 2016

बात पते की कहना चाहूँ-2

बात पते की कहना चाहूँ ,
मगर सुनेगा कौन यहाँ ?

ऐसे में रणबांकुर वह तो ,
क्या-क्या खेल रचाएंगे।
लोगों के मन के भीतर का ,
भाव कैसे जगवाएंगे।
कहने को तो जग अच्छा है ,
जग सच्चा यह बात सही।
मगर एक गन्दी ही मछली ,
जल को विषाक्त कर जाती।
ऐसा में वो क्या कर लेंगे ,
काम बड़ा भरी भरकम ?
कहाँ-कहाँ की बात बताऊँ ,
सब तो अपने धुन में हैं।
जनता पर थोपा है निर्णय ,
पार्टी वालों को बक्शा।
बीस हजार तक माफ़ चन्दा को ,
कैसे वो बतलायेंगे ?
जनता तो गूंगी बाहरी है,
उसको वह बहलायेंगे।
कहाँ-कहाँ की बात बताऊँ ,
सब कुछ तो है छूमंतर ?



उमेश चंद्र श्रीवास्तव - 

Tuesday, December 13, 2016

बात पते की कहना चाहूँ-1

बात पते की कहना चाहूँ ,
मगर सुनेगा कौन यहाँ ?
सबको पैसा-पैसा प्यारा ,
कौन गुनेगा बात यहाँ। 
सुबह शाम 'औ' रात दुपहरी ,
पैसों की तो माया है। 
भला बताओ ऐसे जग में ,
कैशलेस की क्या छाया ?
क्या होगा, कैसे होगा ?
यह तो छूमन्तर ही जाने। 
बड़े-बड़े सब बोल रहे हैं ,
व्यवस्था की कमी बहुत। 
ऐसे में कैसे होगा ,
कैशलेस का मायाजाल। 
इधर विशेषज्ञ बहुत कहेंगे ,
उधर कर्मचारी की कमी। 
ऐसे में तो समझ परे है ,
बात कहाँ से शुरू करूँ। 
कल्पलोक में जीवन जीना ,
भाता सबको मगर सही। 
जीवन की व्यावहारिक बातें ,
आके मिलती जमीं -जमीं। 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव - 








 

Monday, December 12, 2016

रणबांकुरों कहानी आयी-2

रणबांकुरों कहानी आयी,जरा विचारो मन भीतर। भाव जगा कर बोल रहे वो,छूमन्तर कुछ दिन में है।

अरे बताओ वीर बांकुरों ,ऐसा भी क्या होता है?
अपना पैसा जो कुछ संचय ,कर हम बैंकों में है डाले ।
उसे निकलने के खातिर ही,हम पब्लिक लाइन में पीटते ।
कहाँ गयी वह बोली भाषा ,कहाँ गया वह प्रवाहित रक्त।
कब तक बाँकुर तुगलक बातें ,सुन कर हम सब मौन रहें ? क्यों अपना अधिकार गवांकर,मौन धरे चुप बैठे हो ?
लोकतंत्र की मर्यादा है बातें जन-मन रख सकते ।
वरना वह तो मारा खपा कर ,रेटिंग में बढ़ जायेंगे।
अपनी मौलिक चिंतन धारा ,थोप वहां जो बैठे हैं।
अपनी राजनीती की गोटी ,सेक कुर्सी में ऐठें हैं।
हमसे कहते धैर्य धरो तुम ,अपना संसद मौन रहे।
उनके साथी जगह-जगह पर ,अपनी वाणी बोल रहे।
ऐसा भी कहीं होता बाँकुर ,वो बोले हम मौन रहें ?



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -


Sunday, December 11, 2016

रणबांकुरों कहानी आयी-1

रणबांकुरों कहानी आयी ,
जरा विचारो मन भीतर।
भाव जगा कर बोल रहे वो,
छूमन्तर कुछ दिन में है।
बाँकुर कब तक भूल-भुलैया में ,
भरमोगे ,भरमाते हैं।
पतानहीं वह कौन शास्त्री ,
अर्थ की गणना कर रखा।
जाने-माने तो कहते हैं ,
उसे सुना 'औ' पढ़ देखा।
अब बांकुरों तुम ही समझो ,
वो करना क्या चाह रहे ?
भरमाने 'औ' भ्रम में रहना ,
बाँकुर अब तो ठीक नही।
लेकिन क्या तुम कर पाओगे ,
बहुमत में वो बन बैठे।
इसीलिए तो उनने बाँकुर ,
सबका केन्द्रीकरण किया।
न वित्त ,न आरबीआई ,
उनने खुद अधिकार लिया।
अब तो बात संसद से हट कर ,
पब्लिक से वे करते हैं।
कितने लोग चले गए हैं ,
लाइन में लग कर देखा तुमने।
उनके ऊपर श्रद्धा से उनने ,
न कोई न बात कही।
हमें बताते हैं सैनिक वह ,
पर कोई सम्मान नहीं।
कहते हैं छूमंतर होगा ,
पचास दिन इन्तजार करो।
फिर घर बैठे पहले जैसा ,
मुस्काओ 'औ' मन धरो।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -





Saturday, December 10, 2016

हम तो मौन साध कर बैठे-2

हम तो मौन साध कर बैठे ,
तुम बोलो मंचों पे खड़े। 


तुम तो बने खिलाडी अव्वल ,
झांक झरोखा ,भीतर-भीतर। 
जनता को ईमान बता कर ,
खुद स्वयंभू बन बैठे। 
बोलो तुमको महाभारत की ,
बात पुरानी मालूम होगी। 
गीता के उपदेशक कृष्णा ,
बहुत दिया उपदेश मगर। 
धर्म कर्म की बात बताओ ,
अब भी अमल कहाँ करते हैं ?
वैसे लगती नीति तुम्हारी ,
लोगों को सच ही बतलाओ। 
मिथ्या का आडम्बर रचकर,
मिथक तोडना चाह रहे हो। 
संचय की है मूल संस्कृति ,
 उसको ही बिगड़ रहे हो। 
कैसे होगा, कितना होगा ,
सबको ही घूमा डाला। 
अब तो बतलाना ही होगा ,
प्लानिंग क्या-क्या योजन है ?


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -









Friday, December 9, 2016

हम तो मौन साध कर बैठे-1

हम तो मौन साध कर बैठे,
तुम बोलो मंचों पे खड़े। 
हम तो अभी नहीं बोलेंगे ,
तुम बोलो बस अड़े,पड़े। 
 हम तो तुम्हे दिखा ही देंगे ,
आओगे जब मैदानों में। 
तब पूछेंगे वोट कहाँ दे ,
तब तुम खुद ही घिघियाओगे। 
हमे लगा लाइन में बंधू ,
तुम बैठे बस बोल रहे। 
कहाँ-कहाँ की बात बताऊँ ,
तुम तो ऐठे ,बैठे वहां। 
हमको 'सुध' की याद दिलाकर ,
खेल खेलते नीति का। 
हमे समझ के गूंगा-बहरा ,
तुम तो बड़े सचेतक हो। 
कहाँ गया वह राग तुम्हारा ,
कहाँ गयी वह हेकड़पंथी। 
समय बचा है थोड़ा दिन अब ,
छूमन्तर दिखलाओ तुम। 


  

उमेश चंद्र श्रीवास्तव-

Thursday, December 8, 2016

भारत के मुखबोलों तुमने

भारत के मुखबोलों तुमने,
सारी हकीकत कह डाली।
वतन हमारा ,सुन्दर मुखड़ा ,
कथा-कहानी है पाली।
रोज सवेरे उठ कर देखो ,
सुन्दर भाव ही आते हैं।
ह्रदय पटल के अंतर मन में ,
परत सभी खुल जातें हैं।
कहाँ-कहाँ अच्छा होता है ,
कहाँ घिरी है दुःख रजनी ,
कहाँ अबोध दुलार जाता ,
कहा दुहिता है संम्भली।
सब कुछ सुबह बता जाते हैं ,
अंतर मन में देखो तो।
बड़े सलोने सहज ढंग से ,
धीर धरे तुम सोचो तो।
वह देखो अम्बर पे लालिमा ,
छिटक रही है भोरों की।
इधर धरा पर हरी घास है ,
डोलो रही मुखबोलों की।
उधर दौड़ता बच्चा देखो ,
किलकारी की गूँज लिए।
इधर तोतली बोली कह कर ,
मात-पिता की गोद हिये।
उधर गगन में पंछी कलरव,
घूम-घूम के झूम रहे।
इधर धरा पर नदियों का जल ,
मनभावन हिलोर लिए।
उधर दूर पर शिखर बिंदु तल ,
बैठा योगी जप तल्लीन।
इधर प्रिया की अनुगूंजों से ,
प्रियतम का दिल जाये झूम।
इधर पिता भी व्यग्र हो उठे ,
माता कहती-बड़ी हुई।
कुछ तो देखो दौड़ भाग कर ,
पीले करने है अब हाथ।
मौन प्रतिउत्तर पिता कंठ है ,
भावों में उत्साह की गूँज।
धीरे-धीरे पवन बहे है ,
मन की गति आनंदित सूंघ।
झूम-झूम के नाच रहा मन,
अंतर-ही-अंतर में घूम।
कहाँ रहा अब कोई अचरज ,
सभी यथार्थमयी बातें।
मन को गर सब  काबू रखें ,
बात बने, पल में ही हुजूर।
कहाँ डोलती उड़न तश्तरी,
मन को बस काबू कर लो।
सब कुछ मिलेगा इस धरती पर ,
मन तो बड़ा ही सच्चा है।
कच्चा इसको मत होने दो ,
मन तो एकदम जच्चा है।
प्रसव वेदना का वह क्षण बिहवल ,
बाकी तो खुशिया ही हैं।
इसी तरह से मन अवलोकन ,
मन तो एकदम अच्छा है।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-    










Wednesday, December 7, 2016

सपने

सपने हकीकत हो सकते ,
गर आसमान से नीचे ,
धरा पर उतरने की ,
कोशिश हो। 
सपने देखना ,
अच्छा गुण है ,
अगर उसमे ,
यथार्थ का दिया जाये पुट। 
सपने सदैव अपने होते ,
गर उसे हकीकत का ,
जमा पहनाया जाये। 
सपने सलोने होते ,
तो उसे सहेजना जरुरी ,
क्योंकि ,
सुंदरता का निखार ,
संजोने में है। 
संजोना ही ,
जीवन की मूल निधि है। 
उसे नियत में ,
शामिल कर ही ,
आगे बढ़ा जा सकता है। 
वरना सब बेकार। 
साकार से परे ,
हो है जाता। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 







Tuesday, December 6, 2016

कुछ तो खास है

कुछ तो खास है ,
जमाना जो बना बैठा। 
कुछ तो ठाठ है ,
लाइन में भी-बोल रहे जय। 
शायद फकीरी का आलम ,
रहा है,कि लोग-
बोलते हैं ,सराहते है। 
लेकिन प्रश्न भी करते हैं ?
नाराजगी आखिर ,
अपने से ही होती है। 
नाराज होना ,
आत्मीयता का है प्रतीक। 
दुत्कारना ,उलाहना देना ,
'औ' खिलाफ बोलना ,
सब तो है,
आत्मीयता का प्रतीक। 
फिर गुरेज किस बात का। 
सामूहिक यज्ञ में ,
जो धुआं निकलता है। 
उसे कुछ प्रसाद मानते। 
कुछ तो -दूर हट जाते ,
पर बंद ओठ से -
भीतर-भीतर सराहते ,
प्रफुल्लित होते ,
कहते-कुछ तो ,
हुए विकार दूर। 
चाहे धुंए से -
आँखों में -
कुछ धुन्धलाता भरी छाया हो,
पर तासीर तो -है दमदार। 
संस्कार में कुछ ,
नए संयोजन के लिए ,
स्फूर्ति तो आई। 
बहानों से निजात तो मिला। 
 आशा का कुछ संचार तो हुआ। 
वरना हम सब मौन ,
चुपचाप उनके कारनामे ,
देखते ,सुनते 'औ' -
निठल्ले पालतू ,
 जानवर की तरह ,
मालिक के प्रति समर्पित हो ,
उसी की सुरक्षा में ,
रहते तल्लीन। 
कुछ तो बात है ,
जिसे बोलने में -हम ,
हिचकिचा रहे हैं। 
समझने में शरमा रहे हैं। 
'औ' कहने में सकुचा रहे हैं। 
हुआ तो फैसला ,
देश हित में ही तो है। 
अब देखना है -
हमारे समवेत-बाजुओं में ,
कितना दम ख़म है। 
इसे स्वीकारने या ,
इसे नकारने में ,
बहरहाल काम तो ठीक है। 
दबी जुबान से ही सही ,
अंतरमन कह तो रहा है। 
'औ' देखिये विश्व के ,
पटल पट पर ,
मुखरित तो हो रहा है ,
भारत का नाम ,
भारत की कीर्ति ,
'औ' भारत का सम्मान। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-




Monday, December 5, 2016

पांव की गति कम हो जाती है

पांव की गति कम हो जाती है ,
उम्र के ढलान का अहसास दिलाती।
जो पग तीव्र गति से ,
कभी चलायमान थे।
आज कुछ ठगे ,ठहरे से महसूस होते।
निगाहों में पैना पन ,
अनुभव का अटूट अहसास ,
धूप से नही ,
अनुभवी दृष्टि से पके -
माथे पर गिरे हुए बाल।
सब कुछ है -इस देहं धारी ,
माटी की बुत में।
बस है नहीं-तो ,
पगों की वह तीव्रगामी चाप।
बस है नही ,वह-
सांसों का समतल प्रवाह।
टूट जाती हैं सांसें ,
बल पड़ने पर -बिखर जाता है ,
तन-मन का संतुलन।
शायद इसी से-नई पौध ,
 जिसके तले -बड़ी ,बढ़ी ,
आज छनछना जाती है,
उस थके हुए,
पांव की गति ,देखकर।
भुनभुना जाती है ,
उस ढलान की बोली सुनकर ,
तुनुक जाते हैं लोग ,
तीव्र गति से आगे बढ़ ,
यह कहते हैं कि -
बूढ़े पांव को समझना चाहिए ,
कि वह अपने ,
गति वाले के साथ चले।
बस यही सवाल है ,
अनुभवों को नही ,
बाटना चाहती ,
यह नयी पौध।
अपने में मस्त ,
अपनी बात पर ,
दौड़ भाग कर रही ,
यह पौध -कहाँ जाएगी !
कम गति वाले पांव की ,
यही चिंता है ,
जो सवालों के रूप में ,
समाज को झकझोर रही है।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-

Sunday, December 4, 2016

बड़े मजबूर हम तो हैं-2

बड़े मजबूर हम तो हैं ,यही कहते समझ कर के। 
हुआ जो फैसला ,अच्छा ,बहुत ही अच्छा लगता है। 

है यह तो बात गर पक्की ,जरा फिर से बता देना। 
कसम खा के मुकर जाना ,शरीफों की तो आदत है। 
इसी बस खेल में दुनिया जुटी ,दुनिया बेपानी है। 
बताओ सत्य यह बातें ,तुम्हे क़ुरबानी क्यों चाहिए? 
भला तो कर भी कैसे सकते हो ,लोगों पे मेहरबानी। 
पुरानी बात है तुम तो, पुराने लोग जो ठहरे। 
जुगत से बात अपनी रखने में, तुम तो ,तो माहिर हो। 
कसम से सच करो, किस्सा कहाँ ,क्या बेजुबानी है ?
बहस खमोश रह कर सुन भी लेते हो सदन बैठे। 
सभा में ठोक डंका , मुखड़ों पे अजीब रवानी है।  
तेरा कुनबा ,तेरा इतिहास ,जनता को जुबानी है। 
बड़े ही प्रेम से तुम तो सभी से ,यह कहाते हो। 
धरम के तुम पुरोधा हो ,धरम से बात करते हो। 
जुबानी सब तुम्हारा तो ,जुबानी पे ही चलता है। 
कहो तुम कुछ ,सिपाही कुछ करे ,आदत पुरानी है। 
ये जन को क्या कहे ,सब कुछ तुम्हारी मेहरबानी है ?

उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 
 






Saturday, December 3, 2016

बड़े मजबूर हम तो है

बड़े मजबूर हम तो है, यही कहते समझ कर के।
हुआ जो फैसला- अच्छा, बहुत ही अच्छा लगता है।
चलन से पाँच सौ का नोट "औ" हजार के बंद हुए।
कथन उनका यही तो है, इसी से कला धन बंद हो।
इसी बस एक फैसल से, वे भ्रष्टाचार मिटायेंगे।
हुजूरेआला- मेरी आपसे इतनी गुज़ारिश है।
 कसम से सच ही तुम बोलो, वो शादी कैसे होती है।
गरीब दस हजार को तरसे, अमीर करोड़ो खर्चा कर।
पता नही पैसा कैसे बैंक, उनको दे- भुना देता।
है कौड़ी दूर की तो है, मगर यह बात बेमानी।
सयानी दुनिया लगती है, सयाने नेता है सारे।
वो कहते देश बदलेगा, ज़रा तकलीफ तो कर लो।
कसम से वो बचाव भी- बड़ी तरकीब से करते।
पता नही कुर्सी खातिर तो, नही हिकमत तो अच्छी है।
सभी ही जानतें है, बात- यह एकदम से पक्की है।
पुराना रूतबा जाएगा, सभी सामान्य हो जाए।
मगर सत्ता बताये- तब कहा अम्बानी जायेंगे।
कहा पर टाटा बैठेंगे, कहा बिड़ला पधारेंगे। (आगे कल.... )
                                                                                       -उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

Friday, December 2, 2016

विम्ब

स्त्री के उस बिम्ब को-
उभारो-जहाँ बसता है,
मानव मन-जो ,
तरह-तरह के लुभावन से ,
विवश कर देता है स्त्री को। 
अपनी अस्मिता को ,
न्योछावर कर ,
ठग जाने के बाद ,
उसे अहसास होता है ,
कि वह तो बेचारी , 
बेचारी ही रही। 
आधुनिकता की चकाचौंध में ,
तरह-तरह के मानदंडों से ,
उसे ठग जा रहा ,
खामोश-
समाज रुपी चादर को ओढ़े ,
आखिर कब तक,
 उसे दौड़ाएगा ,
यह पूरी दुनिया का ,
आधा हिस्सेदार। 
कब तक !कब तक !! कब तक !!!





Thursday, December 1, 2016

विमर्श

स्त्री विमर्श के नाम ,
परोसा जा रहा दैहिक दर्शन। 
बहुत हो चुका ,
अब तो करो कुछ नया प्रदर्शन। 
लोक,समाज ,द्वंद , फंद का ,
कुचक्र चला जो-
उस पार का बारीक , 
सार्थक हो कुछ लेखन। 
जैसे आज विकास के दौर में ,
अब भी फलता-
अंधी श्रद्धा का दर्शन। 
अनपढ़ ,निपट गंवार ,
ठेठ अंगूठा वाले ,
बने अजब के बाबा। 
करते बल भर शोषण। 
'औ' हम स्वार्थ पूर्ती में ,
भटक-भटक के ,
चक्कर में-उनके आते हैं,
प्रतिदिन ,प्रतिक्षण। 
ऐसे बाबा के खिलाफ ,
खूब हो प्रदर्शन। 
उनको पकड़ कराओ ,
जेल और डंडा दर्शन। 
सबसे  ज्यादा शोषित -
यहाँ हो रही है ,
आधी दुनिया की मालकिन। 
जननी ,बेटी 'औ ' कुलवधू। 
जननी है अटूट ,
श्रद्धा से ओत-प्रोत। 
उसका करो सम्मान ,
करो कुछ नया दिग्दर्शन। 
उमेश चंद्र श्रीवास्तव-




 

Wednesday, November 30, 2016

उज्ज्वल धार जमुन धारा की

उज्ज्वल धार जमुन धारा की ,
नाविक नाव चलते हैं। 
हम सब बिहसे बैठ वहां पर -
जमुन ढंग अवलोकित कर ,
मन में तरह-तरह-भावों को, 
जुगती वासंती रचते। 
तभी तटों के तल ढलान से ,
एक युवक-युवती निकले ,
अलसायी आँखों में समतल  ,
प्रेम ,ख़ुशी के रस झलमल ,
लगता दोनों-इस प्रकृति के ,
खुमारी से मिले ,सम्भले। 
वक्त समय की हरकत पढ़ के ,
थोड़े में ही निपट गए। 
अंतस का संचित रस कुछ तो ,
दोनों ने भोगे ,सोखे। 
अधरावली पे चटक मनोहर ,
दन्त गड़े पन उभर रहे। 
रक्तिम कुछ-कुछ अधर पुटों में ,
लालिम हलकी छिटकी थी। 
सब तो नहीं-मगर कुछ परखी ,
बिम्ब देख ,यह समझ गए। 
जीवन उमरित कोलाहल में ,
सिमटे वे ,विलग भये। 
अब तो प्रेम रहा है दैहिक ,
अब वह प्रेम कहाँ दिखता।  


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -




Tuesday, November 29, 2016

राम राज्य का स्वप्न दिखाना

राम राज्य का स्वप्न दिखाना ,
बच्चों वाली बात नही।
जनता को यूँ ही बहलाना ,
बच्चों वाली बात नहीं।
रोज-रोज निर्देश सुनाना ,
बच्चों वाली बात नहीं।
वादा किया था क्या-क्या तुमने ?
उससे मुकरे,थोप यह देना ,
जनता को यूँ ही फुसलाना ,
बच्चों वाली बात नहीं।
पचास दिनों में 'वो राज्य' को लाना ,
बच्चों वाली बात नहीं।
हसी-मजाक,तंज यूँ कसना ,
अपने को ही 'पाक' बताना,
दूजे को 'वो है' ठहराना ,
बच्चों वाली बात नहीं।
 देश समाज को झटके देना ,
सबको यूँ लाइन लगवाना ,
बच्चों वाली बात नहीं।
यूँ ही 'कल्प-लोक' में जीना,
डींग मार कर ,आत्म प्रशंसा ,
बच्चों वाली बात नहीं।
अंत में बुद्धू बन के लौटना ,
बच्चों वाली बात नहीं।



  

Monday, November 28, 2016

नर ,मन को पढ़ के चलो आगे

नर ,मन को पढ़ के चलो आगे ,
नर ,मन ही सब कुछ करता है।
आगा-पीछा , दायां-बायां ,
सब सोच समझ कर कहता है।
मन सदा-सदा अच्छा कहता ,
दानव जो इसके भीतर है ,
वह ही भरमाता रहता है।
जब लाग-लपेट में तुम आये ,
बस काम गलत करवा जाता।
मन सच्चा है ,मन बच्चा है ,
पुचकारो,उसे दुलारो खुब ,
संयत करके निज भव मद को ,
मन में तौलो, मन में खौलो,
तब बड़ी सावधानी से भाई,
मन के विचार को आने दो।
जो वह कहता-वह सभी करो ,
नाहक अलसायी आँखों में ,
बेमतलब ,बेतुक मत उलझो।
मन दृष्टि रहा ,मन वृष्टि रहा ,
मन के भीतर के भावों को ,
तन भी माने ,जन भी माने ,
बस काम वही करना नर तन ,
मन ही तो सलोना सच्चा है।
मन बच्चा है ,मन बच्चा है।

उमेश चंद्र श्रीवास्तव-





Sunday, November 27, 2016

यह अँधेरा ,दृष्टियों का-4

     यह अँधेरा ,दृष्टियों का ,
     दृष्टिमय अंधे बने हम।

बन्धु बाजी है उसी की ,
वह बना बाजीगर यहाँ।
वह ही जीते ,वह ही रीते ,
हम महज एक पात्र हैं।
सिलवटें बिस्तर की बन कर ,
कब तलक हम मौन हैं ?
युग जो आया-देखते हम,
बन्द होते काम को।
पर नहीं टस से मस है ,
वह बना अविराम है।
देखते हैं-दृष्टि उसकी ,
कुछ बहुत ,कुछ ठीक है।
पर मीमांसक जानते हैं ,
रास्ता उस डोर की।
वह प्रमाणित कह रहे हैं-
बात तो कुछ असमझ।
देखना है-दृष्टि उसकी ,
है कहाँ ,कैसे करेगा।
समय के ही हाट में ,
सब मौन हैं।
देखना है -कौन सी,
बाजीगरी वह कर रहा।
अब बताएगा समय ही ,
बात उसकी क्या रही ?
अब सिखाएगा-समय ही ,
काम कितना ठीक है।
देखना है जोर कितना ,
बात में , क्या दम है उसके ?


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-  



Thursday, November 24, 2016

यह अँधेरा दृष्टियों का -3

        यह अँधेरा दृष्टियों का ,
        दृष्टिमय अंधे बने हम।

दण्ड देना ,फंड देना ,
कार्य का एक माप है।
क्या सभी-सब माप पर ,
उसको भरोसा अब नहीं?
क्या वही-एक मात्र चिंतक ?
बाकी सब बेकार हैं।
इस अकेले पन में यारों ,
कौन उसके साथ है।
क्या कहें क्या न कहें ?
उसने ऐसे आवरण में ,
डाल सब को मथ दिया।
चाह करके भी सभी ,
बात एक ही कर रहे।
काम अच्छा, पर, परंतु ,
लेकिनो में झोल है।
बस इसी एक शब्द आगे ,
सब चुप ,खामोश हैं।
यारों लगता-शब्द का -
कोई चितेरक़ आ गया।
जो हमारे रक्त को ,
उबाल से ठहरा गया।
हमे जो भी कह रहा वह ,
कर रहे चुप-चाप हम ?
वह बताता-वह सुनाता ,
जैसे कोई देव हो।
पर हमारे धर्म में भी ,
देवता को बोलते।
क्या किया ,कैसे किया है ,
हम उसे भी हैं खोलते ?
पर वहां-हम कह रहे क्या ?
यह समझ की बात है।
उसके मीमांसक हमें तो,
जो कहा ,जो भी लिखा है ,
टोकते 'औ' खोलते।
वह बताते-यह सही है ,
वह नहीं, लगता सही।
सप्रमाणित तथ्य देकर ,
वह हमें सब बोलते।
पर यहाँ-हम क्या कहें ?
किससे कहें ,सब मौन हैं।
वह बताएगा-हमे अब ,
कौन हो ,तुम कौन हो !             (शेष कल )





उमेश चंद्र श्रीवास्तव-




Tuesday, November 22, 2016

यह अँधेरा , दृष्टियों का-2

     यह अँधेरा , दृष्टियों का,
     दृष्टिमय अंधे बने हम। 

काट चुटकी-देश हित में ,
आहूत कर सब ,सब सभी। 
वह बताएगा की कितना ,
सांस लेना है तुम्हे। 
वह सिखाएगा की कितना ,
दूर चलना है तुम्हें। 
यारों वह तो ,
कल्पना में जी रहा। 
और हमको सी रहा। 
माना यारों लोग कुछ हैं ,
जिनका निज हित मान है। 
पर उन्हीं -कुछ लोग चलते ,
हम पिसें-क्या धर्म है?
कर्म से बनता है इंसा ,
कर्म ही सब कुछ यहाँ। 
फिर बताओ ,दण्ड कैसा ,
बिन किये हम भुगतते। 
सरफ़रोशी  तमन्ना ,
तुम बताओ,सब में है। 
पर सिखाता वो हमे है ,
देश प्रेमी तुम बनो। 
भावना की तूलिका से-
भाव को वह बांधकर ,
क्या करेगा -पता तो हो ,
हम भी तो जनतंत्र हैं ?  (शेष कल )   

उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 





Monday, November 21, 2016

यह अँधेरा ,दृष्टियों का

यह अँधेरा ,दृष्टियों का ,
दृष्टिमय अंधे बने हम। 
कान से हम सुन रहे हैं ,
आंख से हम देखते। 
पर-पता न कौन सा भय ,
सुन-देख नहीं बोलते। 
यह समय है-वह समय है ,
पर बड़ी है बात-जो ,
समय पर दृष्टि रखकर। 
गर रहे -गर चुप अगर ,
समय जायेगा,लगेगा। 
बोल सकते ,हम चुप रहे?
वह अकेला या कई एक ,
बन्दिशों में जकड़ते। 
किस दिशा में-जा रहे हम। 
बात किस आदर्श की ,
जिसको ओढ़े आ गए हम ,
बात क्यों नहीं-उस तंत्र की। 
चोर बनकर जी रहे हम ,
वह सफाई ले रहा। 
पर नहीं देता सफाई ,
अपनी'औ'निज कुनबे की। 
मौन साधक बनके बैठा ,
जैसे कोई सन्त हो। 
क्या नहीं कुछ भी किया है ?
उसने अपनी राह में। 
एक झीना सा नहीं है ,
आवरण तो ठोस है। 
भीतरों से झांक सकता ,
हम नहीं देखें-उसे। 
युग निर्माता-बन प्रदर्शक ,
कौन सा वह खेलकर -
है नचाता 'औ' सताता ,
मूक बधिर तन्त्र को। 
चाह कर भी सत्य कहना ,
अब हुआ दुशवार है। 
समझ लो-जो बन सचेतक ,
कपट से क्या दूर है ?
बन्धु, भावों का उकेरक ,
भावना से खेलता। 
क्या नहीं है सत्य प्यारे ?
युग प्रदर्शक ,युगदृष्टा -
व्यंग करते हैं कभी ?
पर निहारो-तंज में ,
उसकी कला है अद्वितिय ! (शेष कल )

उमेश चंद्र श्रीवास्तव 








Sunday, November 20, 2016

हमे चाहिये कुछ नहीं तुमसे

हमे चाहिये कुछ नहीं तुमसे ,
तुम जो चाहो कहो, करो। 
हम सब बने निरीह तभी तक ,
जब तक सब्र की सीमा होगी। 

सब्र जो टूटा हम जन-मन का ,
तब तुम झेल नहीं पाओगे। 
दुनियावी के चक्र चला कर ,
किसका हित तुम साध रहे हो। 

मूक बने हम दर्शक कब तक ,
आखिर अंत यहीं आना है। 
माना सत्य आवरण अच्छा ,
जो कहता है निज हित दर्शन।

जरा चलो मैदान में आओ ,
कैसे क्या-क्या जग में होता। 
पकड़ के कुर्सी ऐंठ रहे हो ,
कैसे आये, खर्चा कर के। 

पाक-साफ की ड्रामेबाजी ,
नही चलेगी ,बने प्रदर्शक। 
हल्ला बोलो ,सत्य बातओ ,
नीयत निज स्पष्ट करो। 

क्या तुम सब कुछ ठप्प कराके,
तब आओगे आँसू ढोने। 
जनता कितना साथ तुम्हारा ,
देगी तुमको पता चलेगा। 

बुद्ध-शुद्ध में बने हुंकारी ,
जनता में जो-जो है बोला। 
अब तो भाई सत्य बता दो ,
जनता को क्यों रगड़ रहे हो। 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -






 

Saturday, November 19, 2016

अरे गिलहरी , निरी गिलहरी

अरे गिलहरी ,निरी गिलहरी ,तुम तो बनी प्रतीक यहां। 
वो तो बोल रहें हैं तुमको ,तेरे हित में-हितकारक। 
मगरमच्छ को पकड़ेंगे वो ,तेरे रक्षा के खातिर। 
इतना बड़ा खेल है खेला ,अब तू बनी प्रतिष्ठा सूचक। 
निरी गिलहरी-तुम ज्ञानी हो या ध्यानी हो ,न जानें । 
तेरे ऊपर वार जा रहे -मुक्तक पढ़ने वाले लोग। 
तुमको देखा है धरती पर ,दौड़ भाग के दाना चुनते। 
तू होशियार बहुत साधक है ,दाने खाने हेतु डोले। 
क्या विचार का पुंज है तुझमे ,ये क्या जाने,बस बोले।
तुझपर रपट लिखाना मुश्किल ,खूब पहचान है-उनने। 
तू सुन सकती ,डोल,बोल सकती ,तू -तेरी भाषा अटपट। 
कुछ ही जानकर हैं होते ,जो तेरी बोली पहचाने। 
इसी लिए वो बोल रहे हैं ,तेरी भाषा के दिग्दर्शक। 
हम क्या जाने वो पहचाने ,तेरी नियत चाल विचार ?
इसीलिए -तुझे लक्ष्य कर रहे ,तू छोटी -जब चाहे -तुझको। 
मगरमच्छ को पकड़ेंगे वो,घड़ियालों को माफ़ किया। 
देखो -कैसे पार करेंगे ,गिलहरी तू चुप सुन ले। 
वाद और विवाद में सारे ,टर-टर पीछ राग बोले।
पहला काम किया है उनने ,ऐसा कहते वही ही लोग। 
सुनो गिलहरी लाइन में हो , मगरमच्छ अब होंगे विलीन। 
कितना सुंदर महल अदृश्य ,अंधी गिलहरी,गूँगी गिलहरी। 
डरी और सहमी गिलहरी ,देख क्या-क्या तेरे लिए अब?
कहते हैं वो शब्दों के पुंज ,मगरमच्छ 'औ' गिलहरी। 
दोनों से वो मुक्त बनेंगे ,अब देखेंगे -ओ-गिलहरी। 
अपने को वो क्या कहते हैं ,निरी गिलहरी सुनले तू। 
अरे गिलहरी मत तू नाच ,माना बोल नही सकती तू। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -




Friday, November 18, 2016

चर्चाएं तो प्रबल हो गयीं

चर्चाएं तो प्रबल हो गयीं,किसकी-किसकी बात करे। 
मोहजाल में फंसे परिंदे ,आसमान से भाग रहे। 
बातों में बतधरी कहाँ है ,सभी मुलायम बनते हैं। 
क्रोध,रोष 'औ' बल प्रयोग पर , जीवन का पथ धरते हैं। 
अरे उठो संयत बोलो तुम ,बहुत बड़ा तोरण आया। 
तोरण कैसे बना ,बढ़ा वह ,उसपर कोई बात नही। 
कहा,किया ,औ' पैतरबाजी ,तोरण की है प्रमुख कला। 
नैसर्गिक जीवन में यारों ,चर्चाओं का मोल कहाँ। 
दिया उन्हें अब पिस जाओ ,गेहूं में घुन की तरह। 
गेहूं पिसा प्रदर्शित होता ,घुन का तो अस्तित्व कहाँ। 
माना चर्चा में वह सब कुछ ,पर संयत का भाव कहाँ। 
मन के आवेगों के आगे , सच्चों का अस्तित्व कहाँ। 
बस वो बोले , हम भी बोले ,वह तो प्रबल चितेरक़ हैं। 
तुम नाहक चर्चा में काहे ,खपा रहे अपनी ऊर्जा। 
उनके पास तो हत्था-डोरी ,तेरे पास भला क्या है?
वह तो सत्य नहीं देखेंगे  ,पर वह सत्य सुनाएंगे। 
तुम बस चलो सत्य भूमि पर ,बस इतना बतलायेंगे। 
कसम-वसम उदहारण उनका ,यह तो बेतुक की बातें। 
आगंतुक बनके आये हो ,आगंतुक बन रहो यहाँ। 
चर्चाओं में नाहक पड़ कर ,अपना नाम उजागर क्यों ?
जीवन की अमूल धारा में ,दूजा भी पैतरा चला। 
चुप हो जाओ वरना तुमको ,भूतल से करदेंगे विमुख। 
मुहं लटकाये घाट -घाट पर ,अब खुद जाकर मरो खपो। 

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -







Thursday, November 17, 2016

कुछ सपने जो बिखर रहे हैं

कुछ सपने जो बिखर रहे हैं ,उन पर क्या प्रलाप करें। 
एक ही बार में चौदह गुना ,लोभ किया तो अब झेलो। 
वापस लौटो उसी भूमि पर ,जो कि हमारी संस्कृति थी। 
प्रेम प्यार से जग में रहकर , सब प्राणी से प्रेम करो। 
द्वेष भाव 'औ' छल प्रपंच सब ,कूड़ों में तुरंत फेंको। 
प्रतिशोध का भाव त्याग कर ,कुछ तो संयत हो जाओ। 
वरना युग की धरा में तो ,नहीं-नहीं बच पाओगे। 
जो भी हुआ 'औ' हो रहा ,उसकी बारीकी पकड़ो। 
बहुत समाया हो जायेगा ,तो क्या लेकर जाओगे। 
सरे मनुज बंधु हैं अपने, उनका भी कुछ सुध-बुध लो। 
नाहक झोली को भारी कर ,गल औ कण्ठ सुखाते क्यों ? 
जीवन की समतल भूमि पर ,समतल भाव का प्रकटन हो। 
सुख 'औ' चैन मिले तुमको भी ,उनको राहत मिले सदा?
उसी धुरी पर रहना सीखो ,जीवन का सारा सुख लो। 
दो रोटी से क्षुधा भरेगी ,नाहक अधिक मिले क्यों होते ?
आपस में सब मिल-जुल कर के ,जीवन देश का ध्यान धरो। 
आगे बढो , उन्हें बढ़ने दो ,यही परस्पर अपनाओ। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव 




Wednesday, November 16, 2016

राजनीती की दुक्कड़यी में -2

देश काल की दिशा बदलना ,बच्चों वाला खेल नहीं। 
बातधनी क्या ,बातकही में सत्य-सत्य तुम बस बोलो ?
छू मन्तर का खेल नहीं यह ,जनता ने कुर्सी दी है। 
बिन उनके अरमान को जने ,क्या यह राजतन्त्र नहीं है ?
अपने मुहं से अपनी करनी ,झूठ को सच ,सच को झूठ। 
बड़े मसीहा बनने वाले ,तुमको क्या परिवार पता?
बिना प्रसव के महिला कैसे ,बतलायेगी प्रसव पीड़ा ?
अपने हित में अंधे हो कर ,कर डाला छलमय फैसला। 
अरे चितेरक़ भविष्य देश का दूजे के ही बल होगा। 
जन-मन का कोई भान नहीं है सुना दिया हिटलर फरमान। 
ढाई बरस बचा है ,करलो जो चाहत भी तुमको हो ?
आएंगे आगे भी तुमसे कुछ अच्छा करने वाले। 
कहाँ से रैली होती तेरी ,कहाँ से पब्लिक आती है? 
सब जन जाने रैली में पब्लिक भीड़ कैसे जुटती। 
अरे विशारद बुद्धि देवता तुमको बरमबार प्रणाम। (बाकी कल )



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -




 

Tuesday, November 15, 2016

राजनीती की दुक्कड़यी में

राजनीती की दुक्कड़यी में सज्जनता का भाव कहाँ ?
जो भी कहो वही नहीं करना,उठा देख लो चाणक्य नीति। 
जिसकी उपमा सदा देते सब, कुटूनीति का पुरोधा रहा ,
उठा देख लो उसकी कहनी-करनी में क्या फर्क रहा ?
अर्थ तंत्र पर चोट कर गए ,अब आगे क्या बोलो गे ?
अगर इशारा सही हुआ तो,अब आगे क्या खोलो गे। 
देश हितों के बने चितेरक अपना भी इतिहास कहो ?
बिना प्रूफ के बहुत सी बातें ,सच-सच बोलो सही कहो ?
ईमानदारी का ढोंग रचा कर ,जनता को भरमाते क्यों?
पैसा मेरा क्या,कैसे ,कितना निकालें बतलाओगे तुम ?
तुम्हीं कमा के दे गए मुझको लगता है कुछ ऐसा ही। 
वह रे मेरे शुभ चिंतक तुम ,धन्य-धन्य ही तुम्हे प्रणाम। 
नोट बदलने से सब कुछ है तो आगे की शपथ ,कहो ?
तेरे बाद जो भी आएगा ,क्या वह नोट नहीं बदलेगा?
वाह रे राजनीती के परचम कुछ तो चिंतन मनन करो ?
आवेशों में काम बिगड़ता ,सबको तुमने धो डाला ? (शेष कल.....)


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-











 

Monday, November 14, 2016

भौतिकतावादी युग में तो-2

ताला ऐसा मढ़ा है तूने ,क्या होगा ,क्या सुखशाला ?
मौलिकता जन-मन की होगी ,क्या सब है तेरे ही ऊपर। 
कौन परम्परा तूने ढोया ,सृष्टि का भी विध तोडा। 
तूने किसका साथ दिया है ,जिसे बना उसको छोड़ा। 
तेरा हाल समझ लो प्यारे भीष्म पितामह की होगी। 
मृत्यु शैय्या पड़ा हुआ तू मृत्यु का मांगेगा भीख। 
नहीं मिलेगा दान-पानी ,बात यही सत्यासत्य है। 
चल तू जा अब भाग यहाँ से दूर कहीं जाकर बस जा। 
तेरा कोई काम नहीं है ,ढोंगी ,लोभी ,मतवाला। 
तू भी दे प्रमाण जन-मन को,क्या-क्या सही किया तूने। 
मालूम सब है क्या करता था,और कर रहा अब क्या है ?
बस इसका सबूत नहीं ,बरी हुआ तू जा भाग जा।

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -


Sunday, November 13, 2016

भौतिकतावादी युग में तो

भौतिकतावादी युग में तो, बस अर्थो का औचित्य बढ़ा। 
उसी अर्थ पर नाके बंदी, क्या होगा क्या रोग चढ़ा ?
बिना रोग के रोगी बनकर, जान संख्या कुछ कम होगी। 
पैसा-पैसा हाय यह पैसा, जीवन का हर्षित पल है। 
बारे कानूनों के विशारद, तूने कैसा रच डाला। 
थाती-वाती कुनबा को तो, तोड़-तोड़ मरोड़ डाला। 
अरे समझ तू ओ निर्मोही, भारत संचित देश रहा। 
दूजे के लिहाफ पर तूने, अपना धर्म गंवा डाला।  
क्या-क्या परिवर्तन कर लेगा, निहित स्वार्थ का पुतला तू। 
जो भी शपथ पहल खायी थी, उसको तूने धो डाला। 
जनता को तू मुर्ख समझ कर,नयी परंपरा डाल रहा। 
खेले, बिहंसे, ख़ुशी चैन से, कहा रहें जनता, बाला। (शेष कल.......... )

Saturday, November 12, 2016

अर्थ क्रांति का दौर आ गया

अर्थ क्रांति का दौर आ गया ,पैसा ले कर दौड़ रहे-सब। 
नन्हें-मुन्हें,बूढ़े ,जवान ,उधर बड़ों को साँप सूंघ गया। 
जिनके पास है कलुषित माल ,ताल ठोक कर गाल बजाकर।
खिसियानी बिल्ली से हंसते ,चाल उन्हीं की कम से कमतर,
बड़े नोट का टोटा पड़ गया , बैंक-डाकघरों में भरमार। 
कहाँ पे जाएँ,क्या-क्या लाएं,पैसों फुटकर की है किल्लत। 
घूमा-फिरा के केंद्र बोलता,थोड़ा धैर्य करो तो जन-मन।  
 नए दौर में नया रुपैया,कर जायगा सबको धमाल। 
काली,लाल,पीली आँखों में ,फिर डोलेगी ख़ुशी कमाल। 
नहीं कर रहे थे जो अबतक,अब मजबूरी बानी मिसाल। 
आयकरों की घेरा बंदी में,सबको होना होगा हलाल।
जोड़-तोड़ में कहाँ हैं पीछे ,आयकरों के अधिकारी भी। 
वहीँ बताएँगे जुगती सब , कैसे काला होये लाल। 
बचे-खुचे जो बच जायेंगे , उनको सी.ए. देंगे सलाह।   
यहाँ का जोड़ो,वहां का तोड़ो , पैसे शुद्ध बने सुखलाल। 
पैनी नजरें क्या कर लेंगीं ,ठग तो बहुत रूप में मिलते। 
जनता मिमयाये,मिमयाये,उनको  तो क्या फर्क पड़ेगा। 
वह तो मौज से घूमे फिरें,उनको क्या सुध-बुध जनमन की। 
मगर रास्ता जो दिखलाया,उससे आ गया भूचाल। 
कुछ सुधरेंगे ,कुछ बौने हो,करते जायेंगे कमाल। 
लेकिन वक्त तराजू का तो,राह पे लाएगा उनको फिर।  
कहते जाओ सुनते जाओ,सबके लिए है एक कानून। 
थोड़ा सोचो,थोड़ा मोचो,सब जनता पर मत डालो। 
कुछ तो अपना कुनबा सुधारो,कहाँ से आता चंदा-वंदा। 
उसकी भी कुछ रपट दिखाओ,जनता समझे तुम्हें मिसाल। 
वरना डंका पीटो जो मन,चाहे जनता बहु मिमियाए। 
मौज करो तुम कुर्सी बैठे,जनता होती रहे हलाल। 
वह रे लोकतंत्र के दिग्गज ,फरज तुम्हारा अव्वल यह है। 
जो तुम करो वही अपनाओ,तब जनता समझेगी लाल। 

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -





Friday, November 11, 2016

जीना जंजाल हुआ, दुनिया की बातें

जीना जंजाल हुआ, दुनिया की बातें ,
इनकी सुनो,उनकी सुनो, कैसे कटे रातें।
कहते हैं चोर नहीं , पैसा कहाँ पाए ,
जीवन के संगति में, जोड़-तोड़ आये।
सोचा तो नहीं था , कैसे दिखाएँ ,
माल थोड़ा ज्यादा है ,समझ में न आये।
जाएँ जमा करने, राज खुल जाये ,
इसी उधेड़ बुन में, जंजाल बना जीवन।
ठोक-ताल नेतृत्व , बांछे तो खिल गयीं,
जनता जनार्दन प्रशंसा में जुट गयीं।
जी का जंजाल हुआ ,उनका अब जीवन ,
कैश रख मौज से ,मोछा जो टेयें ।
अब तो हे भैया , मोछा कहाँ  जाये ,
लाग-लपट में , दिनचर्या भरमाये।
सुबक रहे भीतर ही ,आंसू न छलकाऐं ,
कौन जतन करें ,अब पैसा क्या दिखाएँ।
बात सारी समझ बूझ ,रणनीति बनाये,
कैश को कहाँ-कहाँ जमा करने जाये ?
चाप बड़ा तगड़ा है ,मुहं क्या दिखाए?

 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -












Thursday, November 10, 2016

बोट-नोट का चक्र चला तो

बोट-नोट का चक्र चला तो ,
दुनिया हो गयी फानी। 
अमरीका में बोट का डंका ,
ट्रम्प बने गुणखानी।
भारत में नोटों की महिमा ,
बड़-बड़ हो गए पानी। 
पासा फेका ऐसा -उनने ,
चारो खाने चित। 
क्या बोलें ,क्या-क्या खोलें ?
सिट्टी-पिट्टी गुम। 
मात्र यही कथन है वाजिब ,
काम हुआ है अच्छा। 
मोदी तुमने ठोका -
ताल-तुम्हारे में सब हो गए रुंध, 
बड़े-बड़े तूफानी। 
धन्य-धन्य हे भारत सुत तुम ,
तुमको कोटि प्रणाम। 
जनता का भी खट्टा-मिट्ठा ,
अनुभव बाटो अविराम। 
यही तुम्हारा उद्घोष ,
रमे हुए जो सब में। 
समझो-दूर दर्शी तुम तो हो ,
बात समझ लो मेरी। 
बस यही आकांक्षा तुमसे ,
स्वार्थ से उठ कर सोचो। 
आना-जाना कुर्सी का तो ,
लगा हुआ है रहता।
कर जाओ वह काम भी प्यारे ,
बन जाओ सुत पक्के। 
भारतवासी 'औ' भारत माँ ,
तुम्हे देंगे आशीष। 
बढ़ो , करो बस एक काम तुम ,
अच्छे-अच्छे भाई। 
मानव मन  में धर्म की आस्था ,
अपनी-अपनी होती। 
यही हमारा धर्म मनुज है ,
विमर्श करो , कुछ सोचो। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, November 9, 2016

नहीं चाहता याद तुम्हारी

नहीं चाहता याद तुम्हारी ,नहीं चाहता तुम आओ,
यही चाहता रहो जहां तुम ,फलो-फूलो 'औ' आगे बढ़ो।
दुनिया का संताप तुम्हे ,छूने से भी घबराएं ,
कर्म बेली के पथपर आगे , बढ़ो और नित कर्म करो।
विगत का सम्मान करो 'औ'वर्तमान में सुखी रहो ,
आगत का संजो कर सपना ,कर्म मार्ग पर डट जाओ।
तुम्हे मिले हर दिन सुन्दर सा , सुन्दर सा तुम फूल बनो ,
महको खूशबू से अपनी ,जगत सुधामय हो जाओ।
तुम तो अलग-विलग की बातें,न सोचो न ध्यान करो,
कंटक राहों को सुलझाओ 'औ' नया तुम मार्ग गढो।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Tuesday, November 8, 2016

जीवन मिला तो जीना इसे है

जीवन मिला तो जीना इसे है। 
जीने की भी तो बहुत सी कला है। 
पकड़ हाथ चल दो -जो साथी बने हैं। 
करम से जो अपने पैर पे खड़े हैं। 
उन्हें साथ करके-आगे बढ़ो तुम। 
डगर सत्य होगा, करम जो सही। 
यहाँ भाग्य कुछ भी,करम के बिना क्या?
कायरों की बातें ,इसे त्याग बढ़ लो। 
वही बात सच है ,कुटुंब से मिला जो। 
ज़माने की चादर में मत ही पड़ो तुम। 
करम बेल पथ है ,करम ही सभी कुछ। 
इसी बस कला को ,जीवन में धर लो। 
मिलेगा जो चाहो ,नहीं कोई बाधा। 
डगर एक जीवन का , इसको बना लो। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Monday, November 7, 2016

सुबह बात एकदम ही ताजी मिलेगी

सुबह बात एकदम ही ताजी मिलेगी ,
सुखद रोशनी में ये दुनिया खिलेगी।
चमन में जो महके ,वो फूल पड़े हैं ,
उसी गंध में तुम-जरा मुस्कुरा दो।
नहीं जिंदगी में कोई पैबंद रखना ,
कि फूलों के जैसा जीवन में महक लो ।
आओ साथ चल दें ,उसी गुल चमन में ,
जहाँ सत्य ,गंध 'औ' मौसम सुखद है।
यही तो है जीवन की खुशियां लहर है,
सभी जीव अपने-यह प्यारा जगत है।
संजोना सभी को ,हो सम्बन्ध अच्छे ,
यही साथ जायेगा बस सोच लेना।
गुलों का गुलिस्ता यह जीवन वशर है ,
सुखद रागिनी के ही मौसम में रहना।    


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -    

Sunday, November 6, 2016

डम-डम-डम डमरू बाजे

डम-डम-डम डमरू बाजे डम-डम-डम।
मंचों पर नेता है नाचें ,
आवाजों में खनक नहीं है।
 चिल्लाहट और नारे हैं।
लोकतंत्र के अजब पहरुए ,
तेरा कैसा तंत्र बना ?
कहते हो -जब हम आएंगे ,
नंबर वन प्रदेश बनेगा।
स्वार्थी पुतले , ओ नेताओं ,
मुख से तो -समवेत रहो।
झूठी वाणी ,झूठे वादे ,
जनता मुर्ख नहीं होती।
माना जनता सदियों से ही ,
सोती 'औ' बधिर बानी।
पर तेरा क्या फर्ज है पुरुषों ,
पुरुषोचित कुछ कर्म करो।
कैसे आये - तुम गलियों से ,
सड़कों पर मत नृत्य करो।
माना तेरा कुम्भ है आया ,
झूमो,नाचो, मस्ती में ,
दम्भी बन कर -तुम मंचों पर ,
जनता को भरमाते क्यों ?
कौन सत्य है -जो तुम कहते ,
असत्यों के पुतले तुम।
लोकतंत्र की मर्यादा को-
तार-तार, खंडित करते।
अपना-अपना कुनबा भरते ,
अपनी पार्टी का गुणगान।
अपने मुख से अपनी करनी ,
दूजे की भी -तुम सुन लो।
वह मजलूम -खड़ा कोने में ,
फटेहाल-जो सुनता है।
उसको पीछे ,क्यों करते हो ?
आगे -उसको कर, बोलो।
जनता भीतर -जो आकांक्षाएं ,
उसका कुछ परिमार्जन हो।
वार्ना जीतो ,कुर्सी पकड़ो ,
भ्रमण करो ,तुम जी भर के।
फूलों का गलमाल पहन कर,
मंचों पर बस इतराओ। (आगे फिर कभी... )  


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -












Saturday, November 5, 2016

कुछ पीड़ाएँ प्रबल हो गयीं

कुछ पीड़ाएँ प्रबल हो गयीं ,
तो मैंने कुछ गीत लिखे। 
गीतों में सरगम कुछ चाहे ,
हो भी न हो फिर भी तुम। 
सुनो हमारे इन गीतों में ,
प्रेमी का मनुहार नहीं। 
नहीं छंद है इसमें कोई ,
अलंकार की बात सही। 
मगर मैं लिखना चाहूँ ऐसा ,
गीतों में मानवता हो। 
मानव मन में दम्भ न कोई ,
बस करुणा की बातें हों। 
वह जो सड़क तरफ कोने पर ,
घिघियाति बैठी है-जो। 
नहीं मांगती पूँजी,दौलत ,
भिक्षा दे दो तुम उसको कुछ। 
क्या सब हो गयी इतिवृत्ति अब ?
नहीं मनुज तुम, नहीं उसे दो ,
भिक्षा ,केवल काम दो। 
फिर देखो वह बबुनी बनकर ,
नाम करेगी अपना भी। 
और एक नागरिक जुड़ेगा,
भारत का जो सपना है। 
हम सब एक समान बनेंगे ,
गर इस हित-हम सोचें सब। 
यही बात कहानी है केवल ,
यही के कारन गीत लिखा। 
       कुछ पीड़ाएँ प्रबल हो गयीं ,
       तो मैंने कुछ गीत लिखे।

 

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -






Friday, November 4, 2016

यह कविता संसार है सारा

यह कविता संसार है सारा ,
तरह-तरह के फूल  इसमें। 
कुछ में महक ,हैं कुछ बिन महके ,
लेकिन सब में अपनी रंगत ,
कोई चुने , कोई चढ़ाये ,
भक्ति भाव से ,श्रद्धामय हो ,
सबको इससे प्रेम सहज है। 
कोई भेद भाव नहीं इसमें,
हिन्दू ,मुस्लिम,सिक्ख ,ईसाई ,
सब में यह है सबसे दुलारा। 
          यह कविता संसार है सारा ,
          तरह-तरह के फूल  इसमें। 
हिमगिरि के उत्तंग शिखर पर ,
फूल सहज ही खिल जाते हैं। 
जीवन का संचार है उसमे। 
वह देता है भव को अमृत ,
उसमे दोनों भाव हैं मिलते। 
श्रद्धा,भक्ति समन्वय सारा। 
          यह कविता संसार है सारा ,
          तरह-तरह के फूल  इसमें। 
भोर पहर यह खिल जाते हैं। 
प्रकृति के श्रृंगार यही हैं। 
प्रकृति में यह रचे-बसे हैं। 
प्रकृति के उद्गार यही हैं। 
इनसे जीवन जीना सीखो। 
प्रेम और गुलजार यही हैं। 
हरदम हरपल देते रहते। 
कभी नहीं लेने की इच्छा। 
यह तो प्रकृति सुकुमार बहुत हैं।  
इनसे मिलता है सुख सारा। 
              यह कविता संसार है सारा ,
               तरह-तरह के फूल  इसमें।  
आवागमन लोक का सच है। 
काम,क्रोध,मद,लोभ यहाँ है।
प्रेम यहाँ स्थायी भाव। 
बाकी तो सब संचारी हैं। 
सुख दुःख की हैं परतें यहाँ पर। 
कर्मो से सब बंधे हुए हैं। 
कर्मो का रिश्ता है सारा। 
             यह कविता संसार है सारा ,
             तरह-तरह के फूल  इसमें। 










 

Thursday, November 3, 2016

दुर्दिन में आंसू पीकर के

दुर्दिन में आंसू पीकर के ,
स्मृति का देखा बस लेखो।
ढरके मन को विश्राम करो,
बस मौन रहो, तुम मौन रहो। 
काट जायेंगे विश्रांत बादल, 
आने-जाने दो जीभर के।  
आराम शांत बस मौन रहो। 
कट जायेंगे  दुःख रजनी के। 
हर रात के बाद सवेरा है ,
हर सुबह के बाद शाम आती। 
पीड़ाओं की गठरी भी तो,
ऐसे ही चली-चली जाती। 
छलकाओ मत आंसू अपना ,
यह नयन रतन के मोती हैं, 
इनको तो सजोना है तुमको,
सुख में ही बरसाना इनको,
ये सुखद सहज सगोति हैं। 
          दुर्दिन में आंसू पीकर के ,
         स्मृति का देखा बस लेखो।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, November 2, 2016

चन्दन, रोली, आरती

चन्दन, रोली, आरती, हाथ फूल 'औ' माल।
जीवन का सुख इसी में, नित हो गाल गुलाल।
नारी जग की है सखी, गर तुम करलो प्रीत।
वरना वह दुर्गा बानी, हर लेगी हर खींस।
खींस निपोरे जग फिरो, कुछ न होगा काम।
गर तुम प्रेम में रमोगे, जीवन हो सुखधाम।
आथर-पाथर जोड़ना, जीवन का नही मोल।
प्रेम परस्परता बस करो, इसी में जग की जीत।
वरनाो जगत भर, आवारा पशु भात।
कुछ भी न मिल पायेगा, जाते हुए अनाथ।
इसी लिए मैं कह रहा, जीवन एक संगीत।
प्रेम का गो गीत बस, रो बने जगदीस।

उमेश चंद्र श्रीवास्तव-

Tuesday, November 1, 2016

हिमंग शुभ्य भारती

हिमंग शुभ्य भारती ,तरंग ,उमंग उकारती।
विहंग दंग देखते , तिरंग ज्ञान भारती। 
कहे चलो ,कहे चलो, मिटे जनों की कालिमा। 
प्रफुल्लित होये लालिमा , प्रसन्न झूमते चलो। 
                                    कहे चलो, कहे चलो। 
बिगत तो बीत अब गया, आगत की सोच ज्ञानती। 
निर्विघ्न मार्ग हो प्रशस्त , सुधि बने सभी ये जन। 
यही है आश भारती ,कहे चलो ,कहे चलो। 
नगर-नगर ,डगर-डगर ,चमन हो गुल चषकमयी। 
गमक में उसके झूमते , चले नगर -नगर सभी। 
कहें सभी-सभी यहाँ ,है भारती , है भारती। 
                                        कहे चलो कहे चलो। 
प्रताप ,उनका शौर्य है ,उल्लास उनकी दृष्टि है। 
सुपुष्ट देहं  धारियों , स्वदेश के पुजारियों। 
कहे चलो , कहे चलो ,तिरंगा मेरी शान है। 
यह भारतीय की शान है ,उठा इसे कहे चलो। 
                                        कहे चलो , कहे चलो। 
न कोई सर उठा सका , न पार कोई पा सका। 
भुजंग जितने आ डटे , हटा, हटो कहे चलो। 
कहे चलो ,कहे चलो ,सब प्रेम भाव पास हो। 
बस समृद्धि की आश हो ,सुसंस्कृत हों जन सभी। 
                                        कहे चलो ,कहे चलो। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -










Monday, October 31, 2016

क्रंदन

मेरे क्रंदन में तु ही तू ,
निश्चल भाव की पुलकावली। 
जब भी होता -एकांतिक मैं ,
तेरी पीर उहुक भरती । 
जग में केवल एक है रिश्ता,
नर-नारी का वह केवल। 
बाकी रिश्ते-वहीँ से बनते ,
साथी बात पुरानी है। 
और का चाहे जितना सूध-बुध ,
रखलो ,वह तो छोड़ेंगे। 
उनके छूटन में लूटन है। 
केवल इस रिश्ते में प्रेम। 
इसे संभालो, सहज के रक्खो ,
जीवन का तुक इसमें है। 
बाकि सब है खाना-पूर्ती ,
यह रिश्ता तो शाष्वत है। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Sunday, October 30, 2016

दीपदान का पर्व सुहाना

दीपदान का पर्व सुहाना। 
मंगल गीत, मंगलमय हो। 
गण-गण -गण गणपति देवा तो,
रिद्धि-सिद्धि सभी कुछ दें। 
पूर्ण कामना के पालक वो ,
सब में प्रेम सुध भर दे। 
धन,वैभव , लक्ष्मी ,सम्पदा ,
हर जान को सिद्ध वर दें। 
दीपदान का पर्व महान है। 
आरती पूजा अर्चन हो,
सरे नर तन आल्हादित हों ,
धूम धड़ाका करते जोर। 
पोर-पोर ,हर रोम-रोम में ,
ख़ुशी लहार दौड़े बौराय। 
प्रेम सुधा का अमर पर्व यह ,
सब को संभव दृष्टि दे। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-

Saturday, October 29, 2016

सजाओ अब दीपक दिवाली है आयी

सजाओ अब दीपक दिवाली है आयी। 
सुखद रागनी का सलोना दिवस है। 
सजाओ घरों को महक रोशनी से। 
बिछाओ वह बिजली की चादर सुहानी। 
लगे घर सलोना , अजब दीप्ति होगी। 
मनो में यही प्रेम दीपक जलाओ। 
बनाओ नगर को , होये प्रेम पूजा। 
सभी में हो एका न लागे कोई दूजा। 
कि सब डोल, बोलें-यही प्रेम पूजा। 
सड़क हो , दुआरे पड़ाका बजाओ। 
ख़ुशी अब है आयी दिवाली मनाओ। 
वह मुन्ना 'औ' मुन्नी ,मिठाई भी खाओ। 
सरल भाव से तुम दिवाली मनाओ। 
खिले रूप मन में अमर दीप बनके। 
यही लौ हमेशा मनों में जगाओ। 
        सजाओ अब दीपक दिवाली है आयी। 
        सुखद रागनी का सलोना दिवस है। 

सभी मन के उपवन में दीपक जलाओ। 
बड़े गौर से फिर वही गीत गाओ। 
वतन पे मरे जो , वही तो वतन के। 
है वार्ना अकेले तुम बोलो 'औ' जाओ।  
नहीं चाहिए इस जगत मे वह प्राणी। 
जो झूठे का केवल पुलिंदा सुनाये। 
फकत बस नज़र से नहीं देख जाओ। 
वतन के तुम हो, कुछ वतन का सुनाओ। 
      सजाओ अब दीपक दिवाली है आयी। 
      सुखद रागनी का सलोना दिवस है। 
 
घरों में अँधेरा मिटाओ दिया से। 
वही बात मन में ,अंधेरा जो छाया। 
उसे प्रेम दीपक से फिर जगमगाओ। 
ख़ुशी का दिवस है ,मगन गीत गओ। 
हो रोशन भी भीतर ,दिवाली मनाओ। 
रहे पास जो भी वतन के वो प्राणी। 
तिरंगे का मोहक लगन तुम जगाओ। 
      सजाओ अब दीपक दिवाली है आयी। 
      सुखद रागनी का सलोना दिवस है। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -













Friday, October 28, 2016

धनतेरस तेरा अभिनन्दन

धनतेरस तेरा अभिनन्दन , माला-फूल,रोली,चन्दन।
मन भाव से तेरा हम करते , पूजा अर्चन 'औ' निज वंदन।
यह पर्व सुहाना आता जब , सब डोल-हाट में जाते हैं।
वहं विविध प्रकार के फल-मीठा ,आभूषण खूब खरीदते हैं।
अपनी-अपनी  क्षमता लेकर , जनलोग खरीदारी करते।
यह पर्व सुहाना मंगलमय ,वर्षों भर मंगल करता है।
गणपति,भोलेसुत ,गणनायक ,लक्ष्मी संग पूजे जाते हैं।
अमोद-प्रमोद से हर्षित सब ,भावों का पुष्प चढ़ाते हैं।
निर्विघ्न करो हे गणनायक ,जीवन में सुख की बेल बढे।
मन में भावों का यही पुंज लेकर सब उन्हें भजते हैं।
कहते हैं हे लक्ष्मी-गणेश-हर रोज हमारे अंगना में,
लक्ष्मी,वीणा का स्वर गूंजे ,बस और क्या इच्छा है मेरी ?
मानव मन में बस प्रेम जगे , इस  भाव से सब कुछ मिलता है।
जीवन का पावन सब उपवन ,तेरे गूंजों से सिंचित हो।
धनतेरस तेरा अभिनन्दन , माला-फूल,रोली,चन्दन।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Thursday, October 27, 2016

कर्ण का पश्चाताप -2

तुम धन्य हो भ्राता,तुम्हें कोटि धन्यवाद है ,
अब तो नहीं मेरे ह्रदय में कोई भी विषाद है।
तुम अंग होगे राज्य के ,नेतृत्व तेरा हो प्रवीण।
जो साथ तेरे पार्थ हैं ,कृष्ण 'औ' कन्हैया हैं सही।
उनके शरण में तुम रहे ,मैं भी हुआ हूँ धन्य अब।
अविराम श्याम मनोहरी ,अद्भुत छटा अविराम तुम।
है बस तुम्हें प्रणाम केवल ,बस तुम्हे परणाम है।
तुम लघु भ्राता पर तुम्हें धर्मराज कहते सभी।
तुम ही बढाओ देश में,निज कुल के अब तुम नाम को।
जो भी हुआ , जो हो रहा उस चराचर की महिमा सही ।
मुझको नहीं कुछ ग्लानि अब  ,अब तो यहाँ पर चल रहा।
अविराम भारत वर्ष को श्रद्धा सुमन मैं दे रहा।
मैं चला सुखधाम ,तुम सब इस धारणि पर ही रहो ।
जो शेष है कुछ काम , उसको पूर्ण अब तुम ही करो।
जयराम ,जय-जय राम ,और मोहन की बोलो जय कहो।
सुखधाम है , सबकुछ यहीं , मुरली जहाँ पर बज रही।
अविराम ,श्याम की मनोहरी छठा ,ही और ही निखार रही।
हे कृष्ण हे राधा ,राधा कन्हैया बस तुम्हे परणाम।
 धरती , धरा तुम्हें कोटि कोटि अविराम और प्रणाम।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -









Wednesday, October 26, 2016

कर्ण का पश्चाताप

अभिशप्त जीवन जी रहा हूँ ,जन्म से मैं पार्थ तो। 
संकोच , लज्जा ,आवरण की पालकी ढोता रहा। 
माँ हमारी थी मगर ,पर आंचलों से दूर था। 
माँ दुग्ध से वंचित रहा ,पर लाल था इस भूमि का। 
सर्वस्व देने की रही ,बस लालसा युवराज को। 
पाखंड से जो छल रहा था , राज्य के अधिकार को। 
झूठी शपथ , प्रतिशोध की जो अग्नि में जलता रहा। 
सब कुछ लूटा कर अंत में ,जो काल से कवलित हुआ। 
वह उम्र भर लड़ता रहा ,छल 'औ' प्रपंच करता रहा। 
भाभी जननी का न उसे सम्मान मन में था कभी। 
मेरे बलों पे पार्थ तुमसे वह सदा भिड़ता रहा। 
धीरज धरम को त्याग कर ,अपमान वह करता रहा। 
संकोच में , ऋणभार चलते मैं सदा खामोश था। 
मामा शकुनि के घात से भी ,वह सदा अनजान था। 
जो प्रेम के आवरण में , घात ही करते रहे। 
निज बहन खातिर वे सदा प्रतिशोध में जलते रहे। 
जो-जो सिखाया उन्होंने , वह वही सब करता रहा। 
वह क्यों हुआ ? किस वास्ते ? इस अर्थ को जाना नहीं।
सर्वोच्च जीवन में सदा , निज मामा को माना सही। 
अब दुखत्तर सांध्य को मैं हाँथ जोड़े हूँ पड़ा। ........ (शेष कल )

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -





  

Tuesday, October 25, 2016

हर मोड़ पर तुम्हारे , आहट के चिन्ह मिलते।

हर मोड़ पर तुम्हारे , आहट के चिन्ह मिलते।
खामोश तुम रही हो , मुखड़ों के बिम्ब खिलते।
मुझे याद है तुम्हारा , सुन्दर सलोना मुखड़ा ,
ऑंखें तो झिल कमल थीं ,अधर गुलाब टुकड़ा।
चलती थी तुम तो ऐसी , जैसे कापें जलज हों ,
सुन्दर यौवन तुम्हारा ,सब नाक-नक्श अच्छे।
स्वर में मधुर मधुरता ,बस मीठा-मीठा पन था।
शरमा के झुक जो जाती ,जुम्बिश सा बदन होता।
हर बात हर पहर में ,तुम आज भी हो शामिल।
शरीर तो नहीं है ,पर तुम ह्रदय में अब भी ।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव - 

Monday, October 24, 2016

मनुष्य प्रतापी वीर हो तुम।

घुट-घुट करके मत जिओ तुम ,
मनुष्य प्रतापी वीर हो तुम।
जीवन पहर-पहर पर लेता ,
अग्नि परीक्षा चलने दो।
अग्नि में तप करके सोना ,
और खिला खिल जाता है।
वैसे ही जीवन चलता है ,
लक्ष्य करो पथ डट जाओ।
अगर-मगर सब कुछ चलता है ,
जीवन की संगतियाँ हैं।
जो भी डरा ,हटा निज पथ से ,
समझो वह गल ताल मिला। 
ऐसे में क्या घबराना है ,
मनुष्य प्रतापी वीर हो तुम।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Sunday, October 23, 2016

जब मौत मेरी आये

जब मौत मेरी आये ,बस काम यही करना।
दो बूँद मानवता के ,आंसू  छलका देना। 
वैसे तो गज़ब के लोग ,जीवन में मिलते हैं।
वह बातें करते हैं , अच्छे ही बनते हैं।
पर पीठ में वो तो बस , खंजर ही चुभोते हैं।
मेरी मौत पे ऐ यारों , ऐसों को भगा देना।
बस साथ हमारे वो ,जो हमने किया यारों।
दुःख सुख जो भोगा है  ,पैगाम ही जायेगा।
बाकी तो दुनिया में ,सब यहीं रह जायेगा। 

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Saturday, October 22, 2016

राम नाम के पटतरे

राम नाम के पटतरे , बोट मिले रघुनाथ। 
माया ऐसी रच दो ,कुर्सी के हम साथ। 
फिर देखेंगे आपको,कहाँ बसाया जाये। 
लुटिया अब तो डूबती , पार करो रघुनाथ।
जनता गूंगी - बाहरी ,इसका क्या है मोल। 
एक ही लालीपाप में , रीझेगी खुब जोर। 
बोल के नारा राम का ,सब कुछ हो श्रीराम। 
आप हमारे नाथ हैं ,हम सब तुम्हरे दास। 
इसी आस में राम अब ,समर जीत हम जाएँ। 
अंतिम तुम तो आस हो , पार करो रघुनाथ। 
बलवा , जाति ,संप्रदाय तो सब तोहरे हैं दास। 
करो कृपा कुछ फिरसे सही ,रही सही बच जाये। 
तुम्हारे शरण में नाथ हम , आये हैं कर जोड़। 
पार करो रघुनाथ अब ,कुर्सी का है मोह ।  


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-

Friday, October 21, 2016

गद्य और पद्य

गद्य पुरुष है औ पद्य स्त्री ,
आदिकाल में दोनों अलग ,
विलग-विलग सत्ता दोनों की। 
लेकिन धीरे -धीरे ,
समय के प्रवाह ने ,
दोनों को समान कर दिया। 
आज रचे जा रहे -
पद्यमयी गद्य ,
औ' पद्य तो गद्यमयी हो ही गया। 
शायद इसी लिए पद्य में ,
नारी में वह लयता ,
वह कल्पना लोक, 
वह विभक्ति , चुप-चाप,
धीरे-धीरे खिसक गयी है ,
बिलकुल हमारी ,
आज की कविता की तरह। 

Thursday, October 20, 2016

फिर वही मुस्कान लेकर आ गयी हो।

फिर वही मुस्कान लेकर आ गयी हो।
फिर मुझे बेचैन करके भा गयी हो।
रूप की सागर तुम्हे मैं क्या कहूँ अब।
ढाई आखर प्रेम में समां गयी हो।
कोई तुमको प्रेम की देवी कहे है।
कोई तुमको प्रेम पूजा मान बैठा।
पर सदा से तुम बनी श्रद्धा की देवी।
समानता के डोर की पतवार तुम हो।
औ ह्रदय के भाव की उद्गार तुम हो।

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, October 19, 2016

दोनों रचनाएँ महाग्रन्थ -3

यह भारत देश , यह भारत देश।
आपा-धापी में जीते सब।
भागम-भाग मची भाई।
बच्चे घर में जो छोटे हैं ,
उनके लिए है प्लेस्कूल।
माता 'औ 'पिता को कहाँ रही ,
बच्चे को दे निज मन ममता।
अब दौड़म- दौड़ है मची हुई ,
बच्चा पल जाये पैसों बल।
कल-कल जीवन अब कहाँ रहा ,
कल-कल में जुटे हैं सभी मनुज।
पैसे के खातिर काट-पीट।
मिल जाये कुर्सी उच्च अगर।
सब मेल-मिलाप जुगाड़-वाड़ ,
कुर्सी के लिए मची भाई ,
अब तुम्हीं बाताओ ऐसे में,
क्या बच पायेगी निज निजता।
यह भारत देश ,यह भारत देश।
नेता अभिनेता बने हुए।
जैसी पब्लिक वैसा बोले।
धमनी में रक्त प्रवाहित जो ,
उसका भी होता मोल-तोल ,
साहित्य जगत के पुरोधों,
अपनी ही बातें रखते हैं ,
जनहित, जनइच्छा से बिसरे ,
वह रचते सब कुछ अपने हित ।
अब कहाँ 'गोदान 'लिखा जाता।
अब 'होरी' की मरजाद कहाँ ?
अब 'धनिया' जैसी कल्पतरू ,
नारी भी मिलती कहाँ इधर।
सब कुछ ,सब कुछ है गड्ड-मड्ड ,
अब देश की किसको चिंता है।
अपना हित ,अपना कुनबा -
बस इसी बात की फिकर हुई।
 क्या -क्या बतलायें बात तुम्हे ?
सब कुछ तो होता दीख रहा।
ऐसे में भला मेरे भाई ,
क्या-क्या बतलायें अब तुमको ?
यह भारत देश ,यह भारत देश।

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -




  

Tuesday, October 18, 2016

दोनों रचनाएँ महाग्रंथ -2

यह भारत देश ,यह भारत देश ,
सीता जैसी अब नारि कहाँ ?
द्रोपदी का वरन वह करती हैं। 
पर रहा समर्पण वाला सच ,
वह भी तो नहीं नज़र आता। 
जिसको ,जो भी भा जाता है ,
वह उससे नाता जोड़-तोड़ ,
उन्मुक्त पवन के झोके सा ,
चलतीं रहतीं हैं इधर उधर। 
सैंयम नियम का भान कहाँ ,
जो भी मन भाये, रमे वहीँ ,
कुछ वक्त ठहर कर, हे मानव ,
वह ठौर बदल के गयीं उधर। 
सुविज्ञ यह समझो बात जरा -
इसमें हमारी संस्कृति क्या ?
परिहास हो रहा मूल्यों का ,
चिंता किसको है इसकी भला। 
जीवन तो अब है कला -कला। 
क्या ऐसे में हो पायेगा ?
जीवन में सुप्रभात मधुर बेला। (शेष कल ) 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -


 

Monday, October 17, 2016

दोनों रचनाएँ महाग्रंथ

दोनों रचनाएँ महाग्रंथ ,
एक 'रामायण' एक 'महाभारत'।
दोनों में भाई मूल स्वर ,
एक में भाई का भाईपन ,
गद्दी देने की होड़ लगी।
दूजे में एक इंची भूमि ,
देने को भाई राजी नहीं। 
है एक समाज पर काल अलग। 
कैसी समता कैसा विरोध। 
यह भारत देश यह भारत देश। 
यह भारत देश हमारा है , 
जिसमे हम रहते बन प्रदेश। 
कैसा यह झगड़ा आज बना ,
इनका प्रदेश ,उनका प्रदेश। 
सत्ता के भी गलियारे में ,
यह चला-चली का खेल वार। 
कोई पानी के नाम लडे ,
कोई को चाहिए नव प्रदेश। 
भाईचारा की बात कहाँ ?
महाभारत का अंग देश। 
'रामायण' घर घर पढ़ते हैं ,
पर गढ़ते सदा 'महाभारत'। 
अब कहाँ रहे कृष्णा भाई। 
अब कहाँ बांसुरी बजती है। 
अब राधा कहाँ श्रृंगार किये ,
कृष्णा के बगल ठहरती है। 
अब सोलह श्रृंगार का युग गया। 
अब हाथ से चूड़ी-कंगना गया, 
अब नारी नग्न कलाई ही,
चलती फिरती है इधर-उधर। 
सब बात इसी में छिपी हुई। 
खोलो कुछ ऑंखें ,खोल देख -
यह युग जो आया-आया है। 
इसमें सब चलते अनमेल। 
यह भारत देश यह भारत देश। (आगे कल )






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -




बड़े कवि अगर हो ,लिखो बात ऐसी - 4

poem by Umesh chandra srivastava बड़े कवि अगर हो ,लिखो बात ऐसी , धरा का अँधेरा सभी मिट ही जाए। इन्हें भी हो मालूम ये देखें ज़रा सा,...