month vise

Tuesday, December 12, 2017

भय का वातावरण दिखाया

Poem of Umesh chandra srivastava 

भय का वातावरण दिखाया,
भयाक्रांत सब लोग यहां। 
बैठक ,भोजन पर आमंत्रण ,
चर्चा है अब लोक , जहाँ। 
शाशन की मर्यादा ऐसी ,
निजता पर ही प्रश्न उठा। 
कब क्या कह दें शाशन वाले ,
इसका अब है मोल कहाँ।     (शेष कल...)



उमेश चंद्र श्रीवास्तव-
Poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, December 11, 2017

स्मृति

poem of Umesh chandra srivastava 

क्यों मन प्रदीप्त के भीतर ,
वह भोली-भली सूरत ,
बनती है और बिगड़ती ,
वह भोली-भली कीरत। 

आंसूं आँखों से छलके ,
कुछ याद सखी की आयी ,
कुछ स्मृति सी मुस्काई ,
कुछ पल हर्षित से उलझे।    (फिर कभी... )




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem of Umesh chandra srivastava 

Sunday, December 10, 2017

पत्थर

poem of Umesh chandra srivastava

एक पत्थर सलीके से उछालो ,
आसमान साफ है।
कई समाधान हैं।
पर सलीके से -
पत्थर उछालना ,
देख-दाख के।
कहीं उछाला हुआ पत्थर ,
तुम्हें खुद ही ,
चोटिल न कर दे।
पत्थर है भाई।
संवेदनहीन है ,
ऐसा कह सकते हो।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव - 
poem of Umesh chandra srivastava

Saturday, December 9, 2017

मुट्ठियां मत भींचो

poem of Umesh chandra srivastava 

मुट्ठियां मत भींचो ,
तोरियां मत चढ़ाओ। 
अंगार मत बोलो -
खोलो-अपने मन का द्वार ,
जहाँ प्रेम निश्छलता ,
ले रही है अंगड़ाई। 
सत्य को पहचानो ,
अंधता त्यागो ,
आगे खाई है ,
जहां से लौटना ,
मुश्किल है भाई ,
मुश्किल है भाई। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, November 25, 2017

रमई काका-३

A poem of Umesh chandra stivastava 

रमई काका ,
बहुत याद आते। 
गर-आज वो होते ,
तो बताते -क्या सही ,
क्या गलत। 
अब कौन है  ,
यह बताने के लिए ,
यह समझाने के लिए। 
अब तो-हम ,
पूरी तरह से ,
स्वछन्द हो गए। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 
A poem of Umesh chandra stivastava 

Thursday, November 23, 2017

रमई काका -२

poem of Umesh chandra srivastava

कितने सुहाने दिन ,
जब हम स्वतन्त्र थे ,
सब कुछ कहने-चलने ,
खाने बताने के लिए।
मगर अब हम बड़े हो गए ,
यानि समझदारी के ,
उस पड़ाव पर खड़े हो गए ,
जहाँ सब नाप-तौल ,
जहाँ सब नफा मुनाफा ,
सब बचा खुचा को ,
बनाने के चक्कर में ,
सवांरने के लिए ,
सिर्फ स्वतंत्रता को छोड़कर। (जारी... )


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem of Umesh chandra srivastava 

Tuesday, November 21, 2017

रमई काका -1

poem by Umesh chandra srivastava

रमई काका ,
बहुत याद आते। 
जब भी पानी की फुहारें-छिटकतीं। 
जब भी आँखों का पानी झरता। 
जब भी बेहयायी नाचती। 
जब भी लुटेरे-लूट जाते कुनबा। 
रमई काका ,
बहुत याद आते।     (जारी )




उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 
poem by Umesh chandra srivastava

Thursday, October 19, 2017

दीप का पर्व सबको , मुबारक यहाँ।

poem by Umesh chandra srivastava 

दीप का पर्व सबको ,
मुबारक यहाँ। 
सत्य की ज्योति ,
हरदम ही जलती रहे। 
सत्य ही है वही ,
सबका का हित जो करे। 
सत्य को खोलना ,
यहां मुश्किल बहुत। 
सत्य खिलता ,
सदा आवरण में सुखद। 
सत्य की बानगी ,
हर तरफ है इधर। 
राम बन को चले ,
माता झुंझला गयी। 
मात को तब वही ,
सत्य कहकर चले। 
वन में साधू-सन्यासी ,
ऋषि हैं बहुत ,
उनसे ज्ञानों का अर्जन करूंगा सदा। 
माता सुनकर प्रफुल्लित ,
हृदय मग्न हो ,
राम को वन गमन का ,
आशीष दिया। 
ऐसे कितने उदाहरण ,
पड़े हैं यहाँ ,
वक्त आने पे ,
'औ' खोल रखूंगा मैं। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 


Thursday, September 14, 2017

हिंदी दिवस पर

poem by Umesh chandra srivastava 

                      (१)
हिंदी में बिंदी का महत्व जान लीजिये ,
सुन्दर सलोने शब्द को पहचान लीजिये। 
भाषा सुदृण है ज्ञान का अनमोल खज़ाना ,
ब्रह्माण्ड की भाषा बने यह ठान लीजिये। 

औरों की बात और है ,सम्मान सभी का ,
है प्रेम शब्द का विविध विस्तार यहाँ पे । 
हिंदी में शब्द ढेर हैं  अंग्रेजी में कहाँ ,
हिंदी हमारी माँ जननि , उत्थान कीजिये। (क्रमसः)




 उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 
poem by Umesh chandra srivastava 

Saturday, September 2, 2017

प्रेम उपासना


                       (१ )
प्रेम उपासना ,प्रेम तपस्या ,प्रेम जगत व्यव्हार है ,
प्रेम बिना कुछ भी संभव नहीं ,प्रेम मानों का द्वार है।
प्रेम के चलते हम सब मिलते ,प्रेम परस्पर चलता है ,
मगर बाँवरे कुछ ऐसे हैं ,जिन्हें प्रेम यह खलता है।

                       (२ )
चंदा की चकोरी से कोई बात नहीं है ,
लगता है कई दिन से मुलाकात नहीं है।
वह रोज़ तो निश्चित है जब चाँद खिलेगा ,
तब चाँद स्वयं आके चकोरी से मिलेगा।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Tuesday, August 22, 2017

दो बिम्ब

poem by Umesh chandra srivastava
                 
                    (१)
आस्था का मंदिर बनवाने से बेहतर ,
आस्था का बीज बोया जाये।
समदर्शी बनो-भेद-भाव  त्याग ,
चलो प्रेम का फूल खिलाया जाये।
                   (२)
कभी अनुदान की बातें , कभी निष्प्राण सी घातें ,
समय का चक्र ऐसा है -मिले सब बात की बातें।
अनुग्रह कर रहे हैं जो-समझ लो स्वार्थ कोई है ,
भला बोलो इस दुनिया में कहाँ सौगात की बातें।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

भय का वातावरण दिखाया

Poem of Umesh chandra srivastava  भय का वातावरण दिखाया, भयाक्रांत सब लोग यहां।  बैठक ,भोजन पर आमंत्रण , चर्चा है अब लोक , जहाँ...